पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१०

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हंसी-दिल्लगी पी कहीं कमबखत है क्या देवता कर आंख बन्द ! ख्वाबहै, दुनियाँ तुम्हारी जिन्दगी है रोजचन्द ।। दीजिये फूलोंकी माला, वर्फ लाओ दे शराव । देवगण पीते हैं इसको स्वर्गमें समझे जनाब ।। आज मदिराकी बदौलत स्वर्ग यह बंगाल है। जो नही पोता है वह कमबख्त या कंगाल है ।। (६) देशहित कह कहके नाहक फाड़ते हो क्यों गला । कौन परहितमें फंसेगा छोड़के अपना भला ।। देश किमका है, भला किसका कर बतलाइये । क्या हमाग फायदा उमसे जरा समझाइये ।। कुछ कर अपना भला इतनी हमें ताकत नहीं। हो मकेगा दृमरोंका लाभ फिर हमसे नहीं ।। हाँ ढले । लाओ चिलम ! ला बर्फ पानी ! पान दे ! देशहित बकवकके नाहक कौन अपनी जान दे ।। (१०) हाँ चमेलीबी ! मधुर ओठोंको अब फरकाइये । राग नट हम्मीर केदारा जरा सुनवाइये ।। ठीककर हुक्का, पियाला खूब भरकर दीजिये। हाँ अभी दो चार जल्दी दौर पूरे कीजिये ।। सूप चप कटलंट मंगाओं खूब भर भरके पलेट । आग धूआं जो मिलं उससे करो भरपूर पेट ।। पड़ रहो धरतीके ऊपर धूलमें लोटे फिरो। शोर गुल हुल्लड़ मचाओ और उठ उठके गिरो॥