पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१२

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हंसी-दिल्लगी रूप बन्दरका बना हा काम बंदरके किये। बोझ यह धरती उठाती है तुम्हारा किस लिये ।। मात वसुधे, कौन ऐसा पाप था तू ने किया। वाम ऐसे पुत्र गणने पेट तेरेमें लिया ।। जल नहीं गंगामें अव या वेग पारावार में । क्यों डबो देते नहीं हैं, इनको अपनी धारमें ।। चाहते मरना ही हो तो फिर तुम्हें है इग्वतियार । जो नहीं ऐसा तो सँभलो मिलके बैठो एक बार ।। तोड़ दो तबला पखावज साज कर दो चूर चूर । फोड़ दो बोतल करो सब रंडियोंको घरसे दूर ।। तोड़ डालो कोठियां बागोंको झट डालो उखाड़। दुःखको अपना करो आरामको डालो लथाड़॥ नब तलक आंखों तुम्हारी से बराबर जल बहे । जब तलक कष्टोंका कुछ भी लंश भारतमें रहे। -भारतमित्र, सन् १९०४ और १९०६ ई. टेसू आये आये टेसू राजा, पीटो पेट बजाओ बाजा। अबके टेसू रंग रंगीले, छैल छबीले नोक नुकीले । अबके टेसू नमक हलाली, तोड़ तान बजावं ताली। अमलीकी जड़से निकला पतङ्ग, तिसमें निकला शाह मलङ्ग । शाह मलङ्ग चलावं सोटी, उसमें निकली लम्बी चोटी । लम्बी चोटो चिन्दक चिन्दू, तिसमें निकले पक्के हिन्दू । पक्के हिन्दू भवन बनाया, तिसपर कव्वा बैठा पाया । [ ६९५ ]