पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता %3- कव्वेने की, काली बीट, तिसमें निकला चूना इंट । चूने ईंटसे निकला हाल, उसमें निकला आटा दाल । आटे दालसे निकली रोटी, कोई पतली कोई मोटी । रोटी खाई छुटी अंघाई, गङ्गा किरिया रामदुहाई । तब बैठे पञ्चायत जोर, कहत कहानी होगई भोर । सेख मलीमने कही कहानी, चौमासे भर भया न पानी। गेहूं भये सवा नौ सेर, यह देखो किसमतका फेर । बाबू कर मानको हानी, सूखे खेत पड़ा जिमि पानी । ठोकी जाय अदालत अर्जी, ऐसी क्या है रामकी मर्जी ? क्यों नहिं वह करता छिड़काव, क्यों नहीं चलती मड़कपे नाव। मम्मन करो गमपर जारी, काहे सूखी हैं मब क्यारी । रामचन्द्रजी आप न आये, करके एक वकील पठाये । कहै वकील मनोजी राय, ऊंट चढ़े को कुत्ता ग्वाय । अफरीका पर हुई चढ़ाई, बादल गये उधर ही भाई । वह सोना भरकर लावंगे, तब हम भी मेंह वरमावंगे। भारत पर बरसेगी हुन, लग रही है मोनेकी धुन । यह देखो झण्डीकं रंग, सूखे मूसर में बजरंग ।। पहला रंग नाइन एक स्वर्गसे आई, उसने यह सब कथा सुनाई। मारवाड़में पड़ा अकाल, सुनकर बाबू भये निहाल | दौड़ गये नाऊके पास, नाऊके मन बहुत हुलाम । ताऊ कहै सुनोजी बाबू, तुम कैसे बन बैठे हाबू ? लोग देसके भूखे मरें, उनके लिये कहो क्या करें ? ताऊ कहे सुनो रे पूत, किन बहकायो छोरो ऊत । जल्दी घरके मूंद किवाड़, अपना अपना झोंको भाड़ ।