पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१९

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गुप्त-निवन्धावली स्फुट-कविता वही पहनो जो कुछ हो तुमको पसन्द, कसो और भी चुस्त महरमके बन्द । करी और कलियोंका पाजामा चुश्त, वह धानी दुपट्टा वह नकसक दुरुस्त । वह दान्तोंमें मिस्सी घड़ी पर घड़ी, रहे आंख आईने ही से लड़ी। कड़को कड़ेसे बजाती फिरो, वह बांकी अदाय दिखाता फिरो। मगर इतना जीमें रखो अपने ध्यान, यह बाजारी पोशाक है मेरी जान । जना था तुम्हें माने बाजार में, पली शाहआलमके दरबारमें । मिली तुमको बाजारी पोशाक भी, वह थी दोगले काटकी फारसी। वह फिर और भी कटती छटती चली, कि गैबी तमांचेसे मुंह फिर गया, महे चारदह अबमें घिर गया । मेरी गुफ्तगू और हिन्दीके हर्फ, वह शोलाफिशानी यह दरयाय बर्फ । इस अन्दाज पे दिल हुआ लोट पोट, दुलाईमें अतलसके गाढ़ेकी गोट ? खुदाया न क्यों मुझको मौत आगई,

  • तुर्की भाषा में उर्दू छावनी या बाजारको कहते हैं। शाहजहाँके लशकर, ई

भाषाओंके मिलनेसे उर्दू बनी थी। इसीसे इसका नाम बाजारी भाषा अर्थात् 'उर्दू रखा गया। [ ७०२ ]