पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७२०

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हंसी-दिल्लगी वजे रोज उसकी पलटती चली। वही तुमको पोशाक भाती है अब, नहीं और कोई मुहाती है अब । मगर एक सुन आज मतलबकी वात, न पिछला वह दिन है न पिछली वह रात । किया है तलब तुमको सरकारने, तुम आई हो अगरेजी दरवारमें । मो अब छोड़िये शौक बाजारका, अदब कीजिये कुछ तो दरवारका । अबकी जगह है यह दरवार है, कचहरी है यह कुछ न बाजार है। यहां आई हो आंख नीची करो, मटकने चटकने पे अब मत मरो। यहां पर न झांझोंको झनकाइये, दुपट्ट को हरगिज न खिसकाइये। कहांसे मेरे सिरपे सौत आ गई? न झूमर न छपका न बाल रहे, न गेसू मेरे काले-काले रहे। न अतलसका पाजामा कलियों भरा, दुपट्टा गुलाबी मेरा क्या हुआ ? न सुरमा न मिस्सी न मेहंदीका रंग, अजब तेरी कुदरत अजब तेरे ढंग ? न बेलेकी बद्धी न अब हार है, न जुगनू गलेमें तरहदार है। न झांझोंकी झनझन कड़ोंका न शोर, [ ७०३ ]