पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७२६

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हंसी-दिल्लगी सच्चाई वडलाटके जीमें आई, दिखलाव अपनी सच्चाई। मभा जोड़ तब यह फरमाया, जुग जुग रहे हमारा माया । हमही भारतका कल्यान, करके दंगे पद निरबान । कल जो कुछ कौंसिल में किया, वह तो तुमने मब सुन लिया। है कानून जबान हमारी, जो नहीं समझे वही अनारी । हम जो कहें वही कानून, तुम तो हो कोरे पतलून । हमसे सचकी सुनो कहानी, जिससे मरे झूठकी नानी । सच है मभ्य देशकी चीज, तुमको उसकी कहां तमीज ? औरोंको झूठा बतलाना, अपने सचकी डींग उड़ाना । येही पक्का सञ्चापन है, सच कहना तो कच्चापन है। बोले और करे कुछ और, यही मभ्य सञ्चके तौर । मनमें कुछ मुंहपे कुछ और, यही सत्य है करलो गौर । झूठको जो सच कर दिखलावे, सोही सन्चा साधु कहावे । मुंह जिसका होसके न बन्द, समझो उसे सच्चिदानन्द ।। मल्लयुद्ध बनके सच्चोंके सरदार, करके खुब सत्य परचार । धन्यवाद सुनते थे कर्जन, उतरी एक स्वर्गसे दर्जन । उसने लंकर तागा सुई, जादूकी एक ग्योदी कुई । उससे निकली फौजी बात, चली तबेलेमें तब लात । भिड़ गये जङ्गी मुल्की लाट, चक्कीसे चक्कीका पाट । गुत्थमगुत्था धींगा मुश्ती, खूब हुई दोनोंमें कुश्ती । ऊपर किचनर नीचे कर्जन, खड़ी तमाशा देखे दर्जन । लण्डनमें तब पड़ी पुकार, किसकी जीत कौनकी हार । बादशाहने हुक्म सुनाया, सो सुनकर सबके मन भाया । [ ७०९ ]