पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७३१

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता है है उसकी भरी जवानी, यह क्या तुमने दिलमें ठानी, छोड़ चले शाइस्ताखानी ! पहले तो वह धूम मचाई, मुल्कों मुल्कों फिरी दुहाई, सबने जाना कहर खुदाई, अब यह कैसे जीमें आई, छोड़ चले शाइस्ताखानी ! फिरसे जारी की नवाबी, फिरसे छलका रंग गुलाबी, डाकेमें फैली शादाबी, पर यह कैसे हुई खराबी ? छोड़ चले शाइस्ताखानी ! नव्वाबीकी शान निराली, सब कहते थे खूब निकाली, मिलता न था मिजाजे आली, पर अब तो पिटती है ताली, छोड़ चले शाइस्ताखानी ! पांच सदीका गया जमाना, आप चाहते थे फिर लाना, फिरसे वहशीपन फैलाना, उधड़ गया पर ताना बाना, छोड़ चले शाइस्ताखानी । रोक स्वदेशीकी की भारी, नादिरशाही करके जारी,