पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७३७

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता मिन्टो माली कर्जनजी जब देश सिधारे। तब मिन्टोजीने पगधारे । लोग लगे अभिनन्दन देने। चुपके चुपके उत्तर लेने । मारवाड़ियोंसे खुश होकर। कहा बनो तुम रायबहादुर । पढ़ो लिखो मत, मौज उड़ाओ। आये साल उपाधी पाओ। बंगदेशियोंसे यों कहा। तुम तो हो झगड़ालू महा। हम नहीं जाने बंग विभाग। दूर खड़े हो गाओ राग । हम तो भई अब घबराते हैं । लीजे शिमलेको जाते हैं। शिमले चले गये चुप साधी। वहाँ लग गयी अटल समाधी । सुनो विलायतकी अब बात । कन्जरवेटिव खागये मात । बाज उठी लिबरलकी तंत्री। हुए माली भारतमंत्री । मन्त्री होकर कथा सुनाई । सुनो बंगके लोग लुगाई । बंगभंगका है अफसोस। पर अब बात गई सौ कोस । होना था सो हो गया भाई। कमरेख नहिं मिटे मिटाई । मिन्टोसे है अपना मेल । दिन दिन बढ़े प्रीतिकी बेल । गुरु घंटालका स्वप्न . बिछी सवा गज ऊंची खाट । तोशक और तकियोंका ठाट । उसपर पड़े गुरुघंटाल । सुनिये उनका अजब खयाल । करवट लेनेको जब फिरे। औंधे मुंह धरती पर गिरे। छातीमें कुछ आई चोट। आंग्व सूजकर हुई पपोट । चेले गये दौड़कर पास। मुंह लटकाये चित्त उदास । बोले धन्य गुरु महाराज वैर करी ईश्वरने आज । गुरु कहें सब चेले सुनो। मत रोओ मत सिरको धुनो। स्वप्न हमें एक ऐसा आया। नन्हा बालक गोद खिलाया । बहुत देर तक रहे खिलाते। कुछ हंसते कुछ उसे हँसाते ।