पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७६

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अकबर बादशाह पोथियोंही में नहीं ; अमीरसे लेकर कंगाल तकक झोपड़मं अकबरका यश गाया जाता था। वह जीते जी यशम्बी हुआ और आज उमको मरे तीन सौ वर्ष हो गये ; अब भी लोग उसे भूले नहीं हैं। निरक्षरसे निरभर लोग भी अकबरके न्याय और उदार-भावकी कहानियाँ कहा करते हैं। ऐमा भाग्य हरेकका नहीं होता। भाग्यसे अकबरको मुसाहिब भी अच्छे-अच्छे मिले थे। वह उमकी मभाक नौग्न कहलाते थे । अद्वितीय बुद्धिमान राजा टोडरमल उसका वजीर था। उसने लगभग मारे हिन्दुस्थानकी पैमाइश करक हरेक गांवकी अलग-अलग मीमा निकालदी थी। राजा वीरबलमा दानी, दृग्दशी, मिष्ठभापी और प्रत्युत्पन्नमति सभासद् उसे मिला था, जिसके उत्तम व्यवहारसे हिन्दु और मुसलमानोंमें बड़ा मेल होकर भेदभाव उठ गया था। फैजी-मा कवि, अबुलफजलसा मुंशी, ग्वानग्वानामा सेनापति, गजा मानसिंहमा सूबेदार फतहउल्लह और अब्दुलफतहसे हकीम अकबरको मिले थे । गंगसे कवि, तानसेनसे गवैये उसे मिले थे। ऐसे लोग और बादशाहोंको नहीं मिले। एक कवित्त नीचे लिग्बते हैं। उससे अकबरके दरबारके अच्छे-अच्छे लोगोंके नाम मालूम होंगे "दिल्लीसे तख्त बखत मुगलनसे न होयेंगे, होयंगे नगर न कहूँ आगरा नगरसे । गंगसे न गुनी न नानधारी तानसेन जैसे, बूचनसे न कानूगो न दाता बीरवरसे । खाननमें खानखाना, राजनमें राजा मान, होंगे न वजीर कहूँ टण्डन टोडरसे । सात द्वीपके मझार सातहूँ समुद्र पार होंगे न जलालुद्दीन गाजी अकबरसे।" अकबर बादशाहक बसाये हा आगरा, इलाहाबाद, काबुलके पास जलालाबाद आदि नगर और अटक आदि किले मदा उसका म्मरण दिलाते हैं। उसने अपने राज्यको १५ सूबों में बांटा था। हरेक सूबे में एक-एक सूबेदार रहता था और उसके नीचे कई फौजदार होते थे, जो चोरी डाके आदिका पता लगाते थे और बड़े-बड़ जमींदारों और राज्यों-