पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/८३

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गुप्त-निबन्धावली चरित-चर्चा सनद एकके दाम दे, रोकड़ खाता डंठ । जो हुण्टी सिकरै नहीं, जिकरी लिखै बनाय, हुण्डी कोरे पीठ ले, नक धन देय चुकाय । हुण्डीके आरम्भमें मब पता ठिकाना लिखा जावे, किसके रुपये रखे गये, सो लिम्बना चाहिये। रूपये किस चलनके कितने यह सब बान लिखनी चाहिय। ___ हुण्डीके ग्यो जानेपर पेठ लिखना चाहिये, पेठके ग्यो जानेपर पर- पैठ। यदि हुण्डी न सिकरी अर्थात जिमपर की है, वह रुपये न दे तो दुसरे किसीके नाम जिकरी लिखी जावे। जिकरी वाला कोरी पीठकी हुण्डी लेकर रुपये चुका दे। ___ यद्यपि यह नियम बहुत पुराने होगये हैं और हुण्डीका जमाना भी कुछ और होगया है. तथापि इन्हीं नियमोंका पालन अब भी होता है। सगफके लक्षण हुण्डी लिग्वे न हाथरे, जमा न रक्खै भूल । लेय ब्याज ढेव नहीं, सोइ सराफी मूल : सराफ कभी अपने हाथकी हुण्डी लिग्बकर नहीं देता। अर्थात् हुण्डी लिखकर रुपये नहीं लेता। किसीकी पूँजी अपने घरमें नहीं रखता । सूद लेता है, देता कभी नहीं। उसीको सराफ कहना चाहिये। इससे समझ लेना चाहिये कि जो हुण्डी चलाते हैं और सूद देते हैं, वह सराफ नहीं कहला सकते। ___ चौधरीके लक्षण अब तो वह बात रही नहीं, पर पहले जमानेमें चौधरी बाजारका मालिक होता था। टोडरमल उसके लक्षण बताते हैं - धारा बांधै बाट, हाकिम रैयत मानही, सो चौधरका ठाट, जाके सफल अधीन हों। [ ६६ ]