पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/८६

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शग्य मार्दा रखा था। क्या वैश्य, क्या ग्वत्री और क्या दृमर मराफेवाले वही अक्षर लिग्वते हैं, इससे मब विद्या भूल गये। नागरीको इन्हीं अक्षरोंने चौपट किया। यदि यह बात सन्य हो ता टोडरमलके सिर कलङ्क मम- झिये। बिरादरीकी शक्तिको टोडरमलने इतना बढ़ाया था कि विवाह आदिमें उनके गीत गाये जाते हैं। ऐसे पुरुपने क्या मुड़िया अक्षर चलाये होंगे? ---भारत मत्र १९०४ ई. शव सादी छ एस लोग हैं कि जो जाते हैं, पर लोग नहीं जानते कि वह जीते हैं Vया मर गय। कुछ ऐसे हैं कि जो मरकर मर गये और कुछ जीकर जीते हैं। पर कुछ ऐसे भी हैं कि मकड़ों माल हुए मग्गये, भूमि उनकी हड़ियांका कबर ममेत चाट गई, तथापि वह जीते हैं। फारिमके मुमल- मान कवियोंमें गंग्व मादी भी वैसेही लोगों से हैं । माढ छः मौ मालस शव मादीका नाम इम देशमं गूंजता है। महमूद गजनवीक भारतवर्षपर आक्रमण करनेके बाद शव मादी पैदा हुआ। इमसे जमोही उमकी कविताकी धूम ईरान, तूगन, रूम और मिमरमें फली, वमर्माही भारतवपमें भी फैल गई। सैकड़ों वर्ष यहां उसकी कविता मुसलमानी बादशाहत रहनेके कारण बड़ी आदरकी दृष्टिस देवी गई । ग्वाम हिन्दुस्थानका तो क्या कहना, बङ्गदेशमें भी उमकी बड़ी धूम थी। एक बङ्गाली कविन भी अपना नाम मादी रग्या था और शग्व मादीकी कविताका अपनी भापामें अनुवाद किया करता था। उत्तर भारत विशेष-कर दिल्लीप्रांतमें शंख मादीकी इतनी इजत हुई कि कितन ही कायस्थ मवर उठकर मादीकी कविता मंगलार्थ पढ़ते थे । संस्कृतके मुसलमानी राज्यमें एकबार ही दब जाने और फारमीका दौर-