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गोदान : 119
 


उन्हें बड़ा आनंद आता है, यश भी मिलता है, दक्षिणा भी मिलती है। बीमारी में दवा-दारू भी करते हैं, झाड़-फूंक भी, जैसी मरीज की इच्छा हो। और सभा-चतुर इतने हैं कि जवानों में जवान बन जाते हैं, बालकों में बालक और बूढ़ों में बूढ़े। चोर के भी मित्र हैं और साह के भी। गांव में किसी को उन पर विश्वास नहीं है, पर उनकी वाणी में कुछ ऐसा आकर्षण है कि लोग बार-बार धोखा खाकर भी उन्हीं की शरण जाते हैं।

सिर और दाढ़ी हिलाकर बोले--यह तू ठीक कहती है धनिया। धर्मात्मा लोगों का यही धरम है, लेकिन लोक-रीति का निबाह तो करना ही पड़ता है।

इसी तरह एक दिन लाला पटेश्वरी ने होरी को छेड़ा। वह गांव में पुण्यात्मा मशहूर थे। पूर्णमासी को नित्य सत्यनारायण की कथा सुनते, पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे, सिंचाई बेगार में करवाते थे और असामियों को एक-दूसरे से लड़ाकर रकमें मारते थे। सारा गांव उनसे कांपता था गरीबों को दस-दस, पांच-पांच कर्ज देकर उन्होंने कई हजार की संपत्ति बना ली थी। फसल की चीजें असामियों से लेकर कचहरी और पुलिस के अमलों की भेंट करते रहते थे। इससे इलाके भर में उनकी अच्छी धाक थी। अगर कोई उनके हत्थे नहीं चढ़ा, तो वह दारोगा गंडासिंह थे, जो हाल में इस इलाके में आए थे। परमार्थी भी थे। बुखार के दिनों में सरकारी कुनैन बांटकर यश कमाते थे, कोई बीमार-आराम हो, तो उसकी कुशल पूछने अवश्य जाते थे। छोटे-मोटे झगड़े आपस में ही तय करा देते थे। शादी-ब्याह में अपनी पालकी, कालीन और महफिल के सामान मंगनी देकर लोगों का उबार कर देते थे। मौका पाकर न चूकते , पर जिसका खाते थे, उसका काम भी करते थे।

बोले-यह तुमने क्या रोग पाल लिया होरी?

होरी ने पीछे फिरकर पूछा-तुमने क्या कहा लाला-मैंने सुना नहीं।

पटेश्वरी पीछे से कदम बढ़ाते हुए बराबर आकर बोले-यही कह रहा था कि धनिया के साथ क्या तुम्हारी बुद्धि भी घास खा गई? झुनिया को क्यों नहीं उसके बाप के घर भेज देते, सेंत-मेंत में अपनी हंसी करा रहे हो। न जाने किसका लड़का लेकर आ गई और तुमने घर में बैठा लिया। अभी तुम्हारी दो-दो लड़कियां ब्याहने को बैठी हुई हैं, सोचो, कैसे बेड़ा पार होगा?

होरी इस तरह की आलोचनाएं और शुभकामनाएं सुनते-सुनते तंग आ गया था। खिन्न होकर बोला-यह सब मैं समझता हूं लाला। लेकिन तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं। मैं झुनिया को निकाल दूं, तो भोला उसे रख लेंगे? अगर वह राजी हों, तो आज मैं उनके घर पहुंचा दूं। अगर तुम उन्हें राजी कर दो, तो जनम-भर तुम्हारा औसान मानूं, मगर वहां तो उनके दोनों लड़के खून करने को उतारू हो रहे हैं। फिर मैं उसे कैसे निकाल दूं? एक तो नालायक आदमी मिला कि उसकी बांह पकड़कर दगा दे गया। मैं भी निकाल दूंगा, तो इस दसा में वह कहीं मेहनत-मजूरी भी तो न कर सकेगी। कहीं डूब-धंस मरी तो किसे अपराध लगेगा। रहा लड़कियों का ब्याह, सो भगवान् मालिक है। जब उसका समय आएगा, कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा। लड़की तो हमारी बिरादरी में आज तक कभी कुंवारी नहीं रही। बिरादरी के डर से हत्यारे का काम नहीं कर सकता।

होरी नम्र स्वभाव का आदमी था। सदा सिर झुकाकर चलता और चार बातें गम खा लेता था। हीरा को छोड़कर गांव में कोई उसका अहित न चाहता था, पर समाज इतना बड़ा अनर्थ