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120 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


कैसे सह ले। और उसकी मुटमर्दी तो देखो कि समझाने पर भी नहीं समझता। स्त्री-पुरुष दोनों जैसे समाज को चुनौती दे रहे हैं कि देखें, कोई उनका क्या कर लेता है। तो समाज भी दिखा देगा कि उसकी मर्यादा तोड़ने वाले सुख की नींद नहीं सो सकते।

उसी रात को इस समस्या पर विचार करने के लिए गांव के विधाताओं की बैठक हुई।

दातादीन बोले—मेरी आदत किसी की निंदा करने की नहीं है। संसार में क्या-क्या कुकर्म नहीं होता, अपने से क्या मतलब? मगर वह रांड धनिया तो मुझसे लड़ने पर उतारू हो गई। भाइयों का हिस्सा दबाकर हाथ में चार पैसे हो गए तो अब कुपंथ के सिवा और क्या सूझेगी? नीच जात, जहां पेट-भर रोटी खाई और टेढ़े चले, इसी से तो सासतरों में कहा है-नीच जात लतियाए अच्छा।

पटेश्वरी ने नारियल का कश लगाते हुए कहा-यही तो इनमें बुराई है कि चार पैसे देखे और आंखें बदलीं। आज होरी ने ऐसी हेकड़ी जताई कि मैं अपना-सा मुंह लेकर रह गया। न जाने अपने को क्या समझता है। अब सोचो इस अनीति का गांव में क्या फल होगा? झुनिया को देखकर दूसरी विधवाओं का मन बढ़ेगा कि नहीं? आज भोला के घर में यह बात हुई। कल हमारे-तुम्हारे घर में भी होगी। समाज तो भय के बल से चलता है। आज समाज का आंकुस जाता रहे, फिर देखो संसार में क्या-क्या अनर्थ होने लगते हैं।

झिंगुरीसिंह दो स्त्रियों के पति थे। पहली स्त्री पांच लड़के-लड़कियां छोड़कर मरी थी। उस समय इनकी अवस्था पैंतालीस के लगभग थी, पर आपने दूसरा ब्याह किया और जब उससे कोई संतान न हुई तो तीसरा ब्याह कर डाला। अब इनकी पचास की अवस्था थी और दो जवान पत्नियां घर में बैठी थीं। उन दोनों ही के विषय में तरह-तरह की बातें फैल रही थीं, पर ठाकुर साहब के डर से कोई कुछ न कह सकता था, और कहने का अवसर भी तो हो। पति की आड़ में सब कुछ जायज है। मुसीबत तो उसको है, जिसे कोई आड़ नहीं। ठाकुर माहब स्त्रियों पर बड़ा कठोर शासन रखते थे और उन्हें घमंड था कि उनकी पत्नियों का घूंघट किसी ने न देखा होगा। मगर घूंघट की आड़ में क्या होता है, उसकी उन्हें क्या खबर?

बोले-ऐसी औरत का तो सिर काट ले। होरी ने इस कुलटा को घर में रखकर समाज में विष बोया है। ऐसे आदमी को गांव में रहने देना सारे गांव को नष्ट करना है। रायसाहब को इसकी सूचना देनी चाहिए। साफ-साफ कह देना चाहिए, अगर गांव में यह अनीति चली तो किसी की आबरू सलामत न रहेगी।

पंडित नोखेराम कारकुन बड़े कुलीन ब्राह्मण थे। इनके दादा किसी राजा के दीवान थे। पर अपना सब कुछ भगवान् के चरणों में भेंट करके साधु हो गए थे। इनके बाप ने भी राम- नाम की खेती में उम्र काट दी। नोखेराम ने भी वही भक्ति तरके में पाई थी। प्रातःकाल पूजा पर बैठ जाते थे और दस बजे तक बैठे राम-नाम लिखा करते थे, मगर भगवान् के सामने से उठते ही उनकी मानवता इस अवरोध से विकृत होकर उनके मन, वचन और कर्म सभी को विषाक्त कर देती थी। इस प्रस्ताव में उनके अधिकार का अपमान होता था। फूले हुए गालों में धंसी हुई आंखें निकालकर बोले-इसमें रायसाहब से क्या पूछना है। मैं जो चाहूं, कर सकता हूं। लगा दो सौ रुपये डांड़। आप गांव छोड़कर भागेगा। इधर बेदखली भी दायर किए देता हूं।

पटेश्वरी ने कहा-मगर लगान तो बेबाक कर चुका है?