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गोदान : 125
 


'मेरा जी न जाने कैसा हो रहा है ! तुम्हारे ऊपर क्रोध आता है।'

'तुम इतना डरती क्यों हो? मैं तो आ ही रहा हूं।'

'इससे तो कहीं अच्छा था कि किसी दूसरी जगह भाग चलते।'

'जब अपना घर है तो क्यों कहीं भागें? तुम नाहक डर रही हो।'

‘जल्दी से आओगे न?'

'हां-हां, अभी आता हूं।'

'मुझसे दगा तो नहीं कर रहे हो? मुझे घर भेजकर आप कहीं चलते बनो?'

'इतना नीच नहीं हूं झूना ! जब तेरी बांह पकड़ी है, तो मरते दम तक निभाऊंगा।'

झुनिया घर की ओर चली। गोबर एक क्षण दुविधे में पड़ा खड़ा रहा। फिर एकाएक सिर पर मंडराने वाली धिक्कार की कल्पना भयंकर रूप धारण करके उसके सामने खड़ी हो गई। कहीं सचमुच अम्मां मारने दौड़ें, तो क्या हो? उसके पांव जैसे धरती से चिमट गए। उसके और उसके घर के बीच केवल आमों का छोटा-सा बाग था। झुनिया की काली परछाई धीरे-धीरे जाती हुई दीख रही थी। उसकी ज्ञानेंद्रियां बहुत तेज हो गई थीं। उसके कानों में ऐसी भनक पड़ी जैसे अम्मां झुनिया को गाली दे रही हैं। उसके मन की कुछ ऐसी दशा हो रही थी, मानो सिर पर गड़ांसे का हाथ पड़ने वाला हो। देह का सारा रक्त सूख गया हो। एक क्षण के बाद उसने देखा, जैसे धनिया घर से निकलकर कहीं जा रही हो। दादा के पास जाती होगी। साइत दादा खा-पीकर मटर अगोरने चले गए हैं। वह मटर के खेत की ओर चला। जौ-गेहूं के खेतों को रौंदता हुआ वह इस तरह भागा जा रहा था, मानो पीछे दौड़ आ रही है। वह है दादा की मंड़ैया । वह रुक गया और दबे पांव आकर मंडैया के पीछे बैठ गया। उसका अनुमान ठीक निकला। वह पहुंचा ही था कि धनिया की बोली सुनाई दी। ओह ! गजब हो गया। अम्मां इतनी कठोर हैं। एक अनाथ लड़की पर इन्हें तनिक भी दया नहीं आती। और जो मैं सामने जाकर फटकार दूं कि तुमको झुनिया से बोलने का कोई मजाल नहीं है, तो सारी सेखी निकल जा। अच्छा। दादा भी बिगड़ रहे हैं। केले के लिए आज ठीकरा भी तेज हो गया। मैं जरा अदब करता हूं, उसी का फल है। यह तो दादा भी वहीं जा रहे हैं। अगर झुनिया को इन्होंने मारा-पीटा तो मुझसे न सहा जायगा। भगवान्। अब तुम्हारा ही भरोसा है। मैं न जानता था, इस विपत में जान फंसेगी। झुनिया मुझे अपने मन में कितना धूर्त, कायर और नीच समझ रही होगी, मगर उसे मार कैसे सकते हैं? घर से निकाल भी कैसे सकते हैं? क्या घर में मेरा हिस्सा नहीं है? अगर झुनिया पर किसी ने हाथ उठाया, तो आज महाभारत हो जायगा। मां बाप जब तक लड़कों की रक्षा करें, तब तक मां-बाप हैं। जब उनमें ममता ही नहीं है, तो कैसे मां-बाप।

होरी ज्योंही मंडै़या से निकला, गोबर भी दबे पांव धीरे-धीरे पीछे-पीछे चला, लेकिन द्वार पर प्रकाश देखकर उसके पांव बंध गए। उस प्रकाश-रेखा के अंदर वह पांव नहीं रख सकता। वह अंधेरे में ही दीवार से चिमटकर खड़ा हो गया। उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया। हाय । बेचारी झुनिया पर निरपराध यह लोग झल्ला रहे हैं, और वह कुछ नहीं कर सकता। उसने खेल-खेल में जो एक चिंगारी फेंक दी थी, वह सारे खलिहान को भस्म कर देगी, यह उसने न समझा था। और अब उसमें इतना साहस न था कि सामने आकर कहे-हां, मैंने चिंगारी फेंकी थी जिन टिकौनों से उसने अपने मन को संभाला था,