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गोदान : 127
 


होशियार होगा, मजूरी भी तो बढ़ेगी। तब वह दादा से कहेगा, अब तुम घर में बैठकर भगवान् का भजन करो। इस खेती में जान खपाने के सिवा और क्या रखा है? सबसे पहले वह एक पछाई गाय लाएगा, जो चार-पांच सेर दूध देगी और दादा से कहेगा, तुम गऊ माता की सेवा करो। इससे तुम्हारा लोक भी बनेगा, परलोक भी।

और क्या, एक आने में उसका गुजर आराम से न होगा? घर-द्वार लेकर क्या करना है? किसी के ओसारे में पड़ा रहेगा। सैकड़ों मंदिर हैं, धरमसाले हैं! और फिर जिसकी वह मजूरी करेगा, क्या वह उसे रहने के लिए जगह न देगा? आटा रुपये का दस सेर आता है। एक आने में ढाई पाव हुआ। एक आने का तो वह आटा ही खा जायगा। लकड़ी, दाल, नमक, साग यह सब कहां से आएगा? दोनों जून के लिए सेर भर तो आटा ही चाहिए। ओह! खाने की तो कुछ न पूछो। मुट्ठी-भर चने में भी काम चल सकता है। हलुवा और पूरी खाकर भी काम चल सकता है। जैसी कमाई हो। वह आधा सेर आटा खाकर दिन-भर मजे से काम कर सकता है। इधर- उधर से उपले चुन, लकड़ी का काम चल गया। कभी एक पैसे की दाल ले ली, कभी आलू। आलू भूनकर भुरता बना लिया। यहां दिन काटना है कि चैन करना है। पत्तल पर आटा गूंधा, उपलों पर बाटियां सेंकीं, आलू भूनकर भुरता बनाया और मजे से खाकर सो रहे । घर ही पर कौन दोनों जून रोटी मिलती है, एक जून तो चबेना ही मिलता है। वहां भी एक जून चबेने पर काटेंगे।

उसे शंका हुई, अगर कभी मजूरी न मिली तो, वह क्या करेगा? मगर मजूरी क्यों न मिलेगी? जब वह जी तोड़कर काम करेगा, तो सौ आदमी उसे बुलाएंगे। काम सबको प्यारा होता है, चाम नहीं प्यारा होता। यहां भी तो सूखा पड़ता है, पाला गिरता है, ऊख में दीमक लगते हैं, जौ में गेरूई लगती हैं, सरसों में लाही लग जाती है। उसे रात को कोई काम मिल जायगा, तो उसे भी न छोड़ेगा। दिन-भर मजूरी की, रात कहीं चौकीदारी कर लेगा। दो आने भी रात के काम में मिल जाये, तो चांदी है। जब वह लौटेगा, तो सबके लिए साड़ियां लाएगा। झुनिया के लिए हाथ का कंगन जरूर बनवायगा। और दादा के लिए एक मुंड़ासा लाएगा।

इन्हीं मनमोदकों का स्वाद लेता हुआ वह सो गया, लेकिन ठंड में नींद कहां। किसी तरह रात काटी और तड़के उठकर लखनऊ की सड़क पकड़ ली। बीस कोस ही तो है। सांझ तक पहुंच जायगा। गांव का कौन आदमी वहां आता-जाता है और वह अपना ठिकाना ही क्यों लिखेगा, नहीं दादा दूसरे ही दिन सिर पर सवार हो जायंगे। उसे कुछ पछतावा था, तो यही कि झुनिया से क्यों न साफ-साफ कह दिया-अभी तू घर जा, मैं थोड़े दिनों में कुछ कमाकर लौटूंगा, लेकिन तब वह घर जाती ही क्यों? कहती-मैं भी तुम्हारे साथ लौटूंगी? उसे वह कहां- कहां बांधे फिरता?

दिन चढ़ने लगा। रात को कुछ न खाया था। भूख मालूम होने लगी। पांव लड़खड़ाने लगे। कहीं बैठकर दम लेने की इच्छा होती थी। बिना कुछ पेट में डाले, वह अब नहीं चल सकता, लेकिन पास एक पैसा भी नहीं है। सड़क के किनारे झड़बेरियों के झाड़ थे। उसने थोड़े से बेर तोड़ लिए और उदर को बहलाता हुआ चला। एक गांव में गुड़ पकने की सुगंध आई। अब मन न माना। कोल्हाड़ में जाकर लोटा-डोर मांगा और पानी भरकर चुल्लू से पीने बैठा कि एक किसान ने कहा-अरे भाई, क्या निराला ही पानी पियोगे? थोड़ा-सा मीठा खा लो। अबकी और चला