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130 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


'मैंने तुम्हें जो भला-बुरा कहा है, उसकी माफी दे दो भाई। क्रोध में आदमी अंधा हो जाता है। औरत गुन-सहूर में लच्छमी है, मुदा कभी-कभी न जाने कौन-सा भूत इस पर सवार हो जाता है। अब तुम्हीं बताओ, माता पर मेरा क्या बस है? जनम तो उन्हीं ने दिया है, पाला- पोसा तो उन्होंने है। जब कोई बात होगी, तो मैं जो कुछ कहूंगा, लुगाई ही से कहूंगा। उस पर अपना बस है। तुम्हीं सोचो, मैं कुपद तो नहीं कह रहा हूं? हां, मुझे उसके बाल पकड़कर घसीटना न था, लेकिन औरत जात बिना कुछ ताड़ना दिए काबू में भी तो नहीं रहती। चाहती है, मां से अलग हो जाऊं । तुम्हीं सोचो, कैसे अलग हो जाऊं और किससे अलग हो जाऊं। अपनी मां से? जिसने जनम दिया? यह मुझसे न होगा। औरत रहे या जाय।'

गोबर को भी राय बदलनी पड़ी। बोला-माता का आदर करना तो सबका धरम ही है। भाई। माता से कौन उरिन हो सकता है?

कोदई ने उसे अपने घर चलने का नेवता दिया। आज वह किसी तरह लखनऊ नहीं पहुंच सकता। कोस दो-कोस जाते-जाते सांझ हो जायगी। रात को कहीं टिकना ही पड़ेगा।

गोबर ने विनोद किया-लुगाई मान गई?

'न मानेगी तो क्या करेगी।'

'मुझे तो उसने ऐसी फटकार बताई कि मैं लजा गया।'

'वह खुद पछता रही है। चलो, जरा माताजी को समझा देना! मुझसे तो कुछ कहते नहीं बनता। उन्हें भी सोचना चाहिए कि बहू को बाप-माई की गाली क्यों देती है। हमारी भी बहन है। चार दिन में उसकी सगाई हो जायगी । उसकी सास हमें गालियां देगी, तो उससे सुना न जायगा? सब दोस लुगाई ही का नहीं है। माता का भी दोस है। जब हर बात में वह अपनी बेटी का पच्छ करेंगी, तो हमें बुरा लगेगा ही। इसमें इतनी बात अच्छी है कि घर से रूठकर चली जाय, पर गाली का जवाब गाली से नहीं देती।'

गोबर को रात के लिए कोई ठिकाना चाहिए था ही। कोदई के साथ हो लिया। दोनों फिर उसी जगह आए, जहां युवती बैठी हुई थी। वह अब गृहिणी बन गई थी। जरा-सा घूंघट निकाल लिया था और लजाने लगी थी।

कोदई ने मुस्कराकर कहा-यह तो आते ही न थे। कहते थे, ऐसी डांट सुनने के बाद उनके घर कैसे जाय?

युवती ने घूंघट की आड़ से गोबर को देखकर कहा-इतनी ही डांट में डर गए? लुगाई आ जायगी, तब कहां भागोगे?

गांव समीप ही था। गांव क्या था, पुरवा था, दस-बारह घरों का, जिसमें आधे खपरैल के थे, आधे फूस के। कोदई ने अपने घर पहुंचकर खाट निकाली, उस पर एक दरी डाल दी, शर्बत बनाने को कह, चिलम भर लाया। और एक क्षण में वही युवती लोटे में शर्बत लेकर आई और गोबर को पानी का एक छींटा मारकर मानो क्षमा मांग ली। वह अब उसका ननदोई हो रहा था। फिर क्यों न अभी से छेड़-छाड़ शुरू कर दे।