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गोदान : 139
 


'ऐसी एक ही मिसाल दीजिए।'

'मिसेज खन्ना को ही ले लीजिए।'

'लेकिन खन्ना'

'खन्ना अभागे हैं, जो हीरा पाकर कांच का टुकड़ा समझ रहे हैं। सोचिए, कितना त्याग है और उसके साथ ही कितना प्रेम है। खन्ना के रूपासक्त मन में शायद उसके लिए रत्ती-भर भी स्थान नहीं है, लेकिन आज खन्ना पर कोई आफत आ जाय, तो वह अपने को उन पर न्योछावर कर देगी। खन्ना आज अंधे या कोढ़ी हो जायं, तो भी उसकी वफादारी में फर्क न आएगा। अभी खन्ना उसकी कद्र नहीं कर रहे हैं, मगर आप देखेंगे एक दिन यही खन्ना उसके चरण धो-धोकर पिएंगे। मैं ऐसी बीवी नहीं चाहता, जिससे मैं आइंस्टीन के सिद्धांत पर बहस कर सकूं, या जो मेरी रचनाओं के प्रूफ देखा करे। मैं ऐसी औरत चाहता हूं, जो मेरे जीवन को पवित्र और उज्ज्वल बना दे, अपने प्रेम और त्याग से।

खुर्शेद ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए जैसे कोई भूली हुई बात याद करके कहा-आपका बयाल बहुत ठीक है मिस्टर मेहता। ऐसी औरत अगर कहीं मिल जाय, तो मैं भी शादी कर लूं, लेकिन मुझे उम्मीद नहीं है कि मिले।

मेहता ने हंसकर कहा-आप भी तलाश में रहिए, मैं भी तलाश में हूं। शायद कभी तकदीर जागे।

'मगर मिस मालती आपको छोड़ने वाली नहीं। कहिए लिख दूं।'

'ऐसी औरतों से मैं केवल मनोरंजन कर सकता हूं, ब्याह नहीं। ब्याह तो आत्मसमर्पण है।'

'अगर ब्याह आत्मसमर्पण है तो प्रेम क्या है?'

'प्रेम जब आत्मसमर्पण का रूप लेता है, तभी ब्याह है, उसके पहले ऐयाशी है।'

मेहता ने कपड़े पहने और विदा हो गए। शाम हो गई थी। मिर्जा ने जाकर देखा, तो गोबर अभी तक पेड़ों को सींच रहा था। मिर्जा ने प्रसन्न होकर कहा-जाओ, अब तुम्हारी छुट्टी है। कल फिर आओगे?

गोबर ने कातर भाव से कहा-मैं कहीं नौकरी करना चाहता हूं मालिक।

'नौकरी करना है, तो हम तुझे रख लेंगे।'

'कितना मिलेगा हुजूर?'

'जितना तू मांगे।'

'मैं क्या मांगूं। आप जो चाहे दे दें।'

'हम तुम्हें पंद्रह रुपये देंगे और खूब कसकर काम लेंगे।'

गोबर मेहनत से नहीं डरता। उसे रुपये मिलें, तो वह आठों पहर काम करने को तैयार है। पंद्रह रुपये मिलें, तो क्या पूछना। वह तो प्राण भी दे देगा।

बोला-मेरे लिए कोठरी मिल जाय, वहीं पड़ा रहूंगा।

'हां-हां, जगह का इंतजाम मैं कर दूंगा। इसी झोपड़ी में एक किनारे तुम भी पड़े रहना।'

गोबर को जैसे स्वर्ग मिल गया।