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गोदान : 141
 


रख दी और बोली--चलो, मैं आग जलाए देती हूं।

धनिया ने देखा तो जौ के ऊपर एक छोटी-सी डलिया में चार-पांच सेर आटा भी था। आज जीवन में पहली बार वह परास्त हुई। आंखों में प्रेम और कृतज्ञता के मोती भरकर बोली-सब-का-सब उठा लाई कि घर में कुछ छोड़ा? कहीं भागा जाता था?

आंगन में बच्चा खटोले पर पड़ा रो रहा था। पुनिया उसे गोद में लेकर दुलारती हुई बोली-तुम्हारी दया से अभी बहुत है भाभीजी। पंद्रह मन तो जौ हुआ है और दस मन गेहूं। पांच मन मटर हुआ, तुमसे क्या छिपाना है। दोनों घरों का काम चल जायगा। दो-तीन महीने में फिर मकई हो जायगी। आगे भगवान् मालिक है।

झुनिया ने आकर आंचल से छोटी सास के चरण छुए। पुनिया ने असीस दिया। सोना आग जलाने चली, रूपा ने पानी के लिए कलसा उठाया। रुकी हुई गाड़ी चल निकली। जल में अवरोध के कारण जो चक्कर था, फेन था, शोर था, गति की तीव्रता थी, वह अवरोध के हट जाने से शांत मधुर-ध्वनि के साथ सम, धीमी, एक-रस धार में बहने लगा।

पुनिया बोली-महतो को डांड़ देने की ऐसी जल्दी क्या पड़ी थी?

धनिया ने कहा-बिरादरी में सुरखरू कैसे होते?

'भाभी, बुरा न मानो तो, एक बात कहूं?'

'कह, बुरा क्यों मानूंगी?'

'न कहूंगी, कहीं तुम बिगड़ने न लगो?'

'कहती हूं, कुछ न बोलूंगी, कह तो।'

'तुम्हें झुनिया को घर में रखना न चाहिए था।'

'तब क्या करती? वह डूब मरती थी।'

'मेरे घर में रख देती। तब तो कोई कुछ न कहता।'

'यह तो तू आज कहती है। उस दिन भेज देती, तो झाडू लेकर दौड़ती|'

'इतने खरच में तो गोबर का ब्याह हो जाता।'

'होनहार को कौन टाल सकता है पगली! अभी इतने ही से गला नहीं छूटा, भोला अब अपनी गाय के दाम मांग रहा है। तब तो गाय दी थी कि मेरी सगाई कहीं ठीक कर दो। अब कहता है, मुझे सगाई नहीं करनी, मेरे रुपये दे दो। उसके दोनों बेटे लाठी लिए फिरते हैं। हमारे कौन बैठा है, जो उससे लड़े। इस सत्यानासी गाय ने आकर घर चौपट कर दिया।'

कुछ और बातें करके पुनिया आग लेकर चली गई। होरी सब कुछ देख रहा था। भीतर आकर बोला-पुनिया दिल की साफ है।

'हीरा भी तो दिल का साफ था?'

धनिया ने अनाज तो रख लिया था, पर मन में लज्जित और अपमानित हो रही थी। यह दिनों का फेर है कि आज उसे यह नीचा देखना पड़ा।

'तू किसी का औसान नहीं मानती, यही तुझमें बुराई है।

'औसान क्यों मायूं? मेरा आदमी उसकी गिरस्ती के पीछे जन नहीं दे रहा है? फिर मैंने दान थोड़े ही लिया है। उसका एक-एक दाना भर दूंगी।'

मगर पुनिया अपनी जिठानी के मनोभाव समझकर भी होरी का एहसान चुकाती जाती थी। जब अनाज चुक जाता, मन-दो-मन दे जाती, मगर जब चौमासा आ गया और वर्षा