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गोदान : 161
 


हैं। कौंसिल के मेंबर तो हैं ही। अधिकारियों में भी उनका काफी रुसूख है। वह चाहें, तो उन पर झूठे मुकदमे चलवा सकते हैं, अपने गुंडों से राह चलते पिटवा सकते हैं , लेकिन ओंकार इन बातों से नहीं डरता। जब तक उसकी देह में प्राण है, वह आततायियों की खबर लेता रहेगा।

सहसा मोटरकार की आवाज सुनकर वह चौंके। तुरंत कागज लेकर अपना लेख आरंभ कर दिया। और एक ही क्षण में रायसाहब ने उनके कमरे में कदम रखा।

ओंकारनाथ ने न उनका स्वागत किया, न कुशल-क्षेम पूछा, न कुरसी दी। उन्हें इस तरह देखा, मानो कोई मुलजिम उनकी अदालत में आया हो और रोब से मिले हुए स्वर में पूछा-आपको मेरा पुरजा मिल गया था? मैं वह पत्र लिखने के लिए बाध्य नहीं था, मेरा कर्त्तव्य यह था कि स्वयं उसकी तहकीकात करता, लेकिन मुरौवत सिद्धांतों की कुछ न कुछ हत्या करनी ही पड़ती है। क्या उस संवाद में कुछ सत्य है?

रायसाहब उसका सत्य होना अस्वीकार न कर सके। हालांकि अभी तक उन्हें जुरमाने के रुपये नहीं मिले थे और वह उनके पाने से साफ इंकार कर सकते थे, लेकिन चह देखना चाहते थे कि यह महाशय किस पहलू पर चलते हैं।

ओंकारनाथ ने खेद प्रकट करते हुए कहा-तब तो मेरे लिए उस संवाद को प्रकाशित करने के सिवा और काई मार्ग नहीं है। मुझे इसका दु:ख है कि मुझे अपने एक परम हितैषी मित्र की आलोचना करनी पड़ रही हैं, लेकिन कर्त्तव्य के आगे व्यक्ति कोई चीज नहीं। संपादक अगर अपना कर्तव्य न पूरा कर सके तो उसे इस आसन पर बैठने का कोई हक नहीं है।

रायसाहब कुरसी पर डट गए और पान की गलौरियां मुंह में भरकर बोले-लेकिन यह आपके हक में अच्छा न होगा। मुझे जो कुछ होना हैं, पीछे होगा, आपको तत्काल दंड मिल जायगा। अगर आप मित्रों की परवाह नहीं करते, तो मैं भी उसी कैंड़े का आदमी हूं।

ओंकारनाथ ने शहीद का गौरव धारण करके कहा-इसका तो मुझे कभी भय नहीं हुआ। जिस दिन मैंने पत्र-संपादन का भार लिया, उसी दिन प्राणों का मोह छोड़ दिया और मेरे समीप एक संपादक की सबसे शानदार मौत यही है कि वह न्याय और सत्य की रक्षा करता हुआ अपना बलिदान कर दे।

'अच्छी बात है। मैं आपकी चुनौती स्वीकार करता हूं। मैं अब तक आपको मित्र समझता आया था, मगर अब आप लड़ने ही पर तैयार हैं, तो लड़ाई ही सही। आखिर मैं आपके पत्र का पंचगुना चंदा क्यों देता हूं? केवल इसलिए कि वह मेरा गुलाम बना रहे। मुझे परमात्मा ने रईस बनाया है। आपके बनाने से नहीं बना हूं। साधारण चंदा पंद्रह रुपया है। मैं पचहत्तर रुपया देता हूं, इसलिए कि आपका मुंह बंद रहे। जब आप घाटे का रोना रोते हैं और सहायता की अपील करते हैं, और ऐसी शायद ही कोई तिमाही जाती हो, जब आपकी अपोल न निकलती हो, तो मैं ऐसे मौके पर आपकी कुछ-न-कुछ मदद कर देता हूं। किसलिए? दीपावली, दशहरा, होली में आपके यहां बैना भेजता हूं, और साल पच्चीस बार आपकी दावत करता हूं, किसलिए? आप रिश्वत और कर्तव्य दोनों साथ-साथ नहीं निभा सकते।

ओंकारनाथ उत्तेजित होकर बोले- मैंने कभी रिश्वत नहीं ली।