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गोदान : 195
 


ऐसी क्या जल्दी है? कुछ आराम कर लो, कुछ खा-पी लो। सारा दिन तो पड़ा है। यहां बड़ी-बड़ी पंचायत हुई। पंचायत ने अस्सी रुपये डांड़ के लगाए। तीस मन अनाज ऊपर। उसी में तो और तबाही आ गई।

सोना बालक को कपड़े-जूते पहनाकर लाई। कपड़े पहनकर वह जैसे सचमुच राजा हो गया था। गोबर ने उसे गोद में ले लिया, पर इस समय बालक के प्यार में उसे आनंद न आया। उसका रक्त खौल रहा था और कमर के रुपये आंच और तेज कर रहे थे। वह एक-एक से समझेगा। पंचों को उस पर डांड़ लगाने का अधिकार क्या है? कौन होता है कोई उसके बीच में बोलने वाला? उसने एक औरत रख ली, तो पंचों के बाप का क्या बिगाड़ा? अगर इसी बात पर वह फौजदारी में दावा कर दे, तो लोगों के हाथों में हथकड़ियां पड़ जाएं। सारी गृहस्थी तहस-नहस हो गई। क्या समझ लिया है उसे इन लोगों ने।

बच्चा उसकी गोद में जरा-सा मुस्कराया, फिर जोर से चीख उठा, जैसे कोई डरावनी चीज देख ली हो।

झुनिया ने बच्चे को उसकी गोद से ले लिया और बोली अब जाकर नहा-धो लो। किस सोच में पड़ गए? यहां सबसे लड़ने लगो, तो एक दिन निबाह न हो। जिसके पास पैसे हैं, वही बड़ा आदमी है, वही भला आदमी है। पैसे न हो, तो उस पर सभी रोब जमाते हैं।

'मेरा गधापन था कि घर से भागा, नहीं देखता, कैसे कोई एक धेला डांड़ लेता है।'

'शहर की हवा खा आए हो, तभी ये बातें सूझने लगी हैं, नहीं घर से भागते ही क्यों।'

'यही जी चाहता है कि लाठी उठाऊं और पटेश्वरी, दातादीन, झिंगुरी, सब सालों को पीटकर गिरा दूं और उनके पेट से रुपये निकाल लूं।'

'रुपये की बहुत गर्मी बढ़ी है साइत। लाओ निकालो, देखूं, इतने दिन में क्या कमा लाए हो?'

उसने गोबर की कमर में हाथ लगाया। गोबर खड़ा होकर बोला-अभी क्या कमाया, हां, अब तुम चलोगी, तो कमाऊंगा। साल-भर तो सहर का रंग-ढंग पहचानने ही में लग गया।

'अम्मां जाने देंगी, तब तो?'

'अम्मां क्यों न जाने देंगी? उनसे मतलब?'

'वाह। मैं उनकी राजी बिना न जाऊंगी। तुम तो छोड़कर चलते बने। और मेरा कौन था यहां? वह अगर घर में न घुसने देतीं तो मैं कहां जाती? जब तक जीऊंगी, उनका जस गाऊंगी और तुम भी क्या परदेस ही करते रहोगे?'

'और यहां बैठकर क्या करूंगा? कमाओ और मरो, इसके सिवा और यहां क्या रखा है? थोड़ी-सी अक्कल हो और आदमी काम करने से न डरे, तो वहां भूखों नहीं मर सकता। यहां तो अक्कल कुछ काम नहीं करती। दादा क्यों मुंह फुलाए हुए हैं?'

'अपने भाग बखानो कि मुंह फुलाकर छोड़ देते हैं। तुमने उपद्रव तो इतना बड़ा किया था कि उस क्रोध में पा जाते, तो मुंह लाल कर देते।'

'तो तुम्हें भी खूब गालियां देते होंगे?'

'कभी नहीं, भूलकर भी नहीं अम्मां तो पहले बिगड़ी थीं, लेकिन दादा ने तो कभी कुछ नहीं कहा, जब बुलाते हैं, बड़े प्यार से। मेरा सिर भी दुखता है, तो बेचैन हो जाते हैं। अपने बाप को देखते तो मैं इन्हें देवता समझती हूं। अम्मां को समझाया करते हैं, बहू को कुछ न कहना। तुम्हारे ऊपर सैकड़ों बार बिगड़ चुके हैं कि इसे घर में बैठाकर आप न जाने कहां निकल गया।