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198 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


तक न करता। देखता, कौन मुझे बिरादरी से अलग करता है, लेकिन तुम बैठे ताकते रहे।

होरी ने अपराधी की भांति सिर झुका लिया, लेकिन धनिया यह अनीति कैसे देख सकती थी? बोली-बेटा, तुम भी अंधेर करते हो। हुक्का-पानी बंद हो जाता, तो गांव में निर्वाह कैसे होता, जवान लड़की बैठी है, उसका भी कहीं ठिकाना लगाना है या नहीं? मरने-जीने में आदमी बिरादरी...

गोबर ने बात काटी-हुक्का-पानी सब तो था, बिरादरी में आदर भी था, फिर मेरा ब्याह क्यों नहीं हुआ? बोलो! इसलिए कि घर में रोटी न थी। रुपये हों तो न हुक्का-पानी का काम है, न जात-बिरादरी का। दुनिया पैसे की है, हुक्का-पानी कोई नहीं पूछता।

धनिया तो बच्चे का रोना सुनकर भीतर चली गई और गोबर भी घर से निकला। होरी बैठा सोच रहा था। लड़के की अकल जैसे खुल गई है। कैसी बेलाग बात कहता है। उसकी वक्र बुद्धि ने होरी के धर्म और नीति को परास्त कर दिया था।

सहसा होरी ने उससे पूछा-मैं भी चला चलूं

'मैं लड़ाई करने नहीं जा रहा हूं दादा, डरो मत। मेरी ओर तो कानून है, मैं क्यों लड़ाई करने लगा?'

'मैं भी चलूं तो कोई हरज है?'

'हां, बड़ा हरज है। तुम बनी बात बिगड़ दोगे।'

होरी चुप हो गया और गोबर चल दिया।

पांच मिनट भी न हुए होंगे कि धनिया बच्चे को लिए बाहर निकली और बोली-क्या गोबर चला गया, अकेले? मैं कहती हूं, तुम्हें भगवान् कभी बुद्धि देंगे या नहीं। भोला क्या सहज में गोई देगा? तीनों उस पर टूट पड़ेंगे बाज की तरह। भगवान् ही कुसल करें। अब किस्से कहूं दौड़कर गोबर को पकड़ लो। तुमसे तो मैं हार गई।

होरी ने कोने से डंडा उठाया और गोबर के पीछे दौड़ गांव के बाहर आकर उसने निगाह दौड़ाई। एक क्षीण-सी रेखा क्षितिज से मिली हुई दिखाई दी। इतनी ही देर में गोबर इतनी दूर कैसे निकल गया। होरी की आत्मा उसे धिक्कारने लगी। उसने क्यों गोबर को रोका नहीं? अगर वह डांटकर कह देता, भोला के घर मत जाओ, तो गोबर कभी न जाता। और अब उससे दौड़ा भी तो नहीं जाता। वह हारकर वहीं बैठ गया और बोला-उसकी रच्छा करो महावीर स्वामी।

गोबर उस गांव में पहुंचा तो देखा, कुछ लोग बरगद के नीचे बैठे जुआ खेल रहे हैं। उसे देखकर लोगों ने समझा, पुलिस का सिपाही है। कौड़ियां समेटकर भागे कि सहसा जंगी ने पहचानकर कहा-अरे, यह तो गोबरधन है।

गोबर ने देखा, जंगी पेड़ की आड़ में खड़ा झांक रहा है। बोला-डरो मत जंगी भैया, मैं हूं। रामराम आज ही आया हूं। सोचा, चलूं सबसे मिलता आऊं, फिर न जाने कब आना हो। मैं तो भैया, तुम्हारे आसिरवाद से बड़े सजे में निकल गया। जिस राजा की नौकरी में हूं उन्होंने मुझसे कहा है कि एक-दो आदमी मिल जाएं तो लेते आना। चौकीदारी के लिए चाहिए।

मैंने कहा, सरकार ऐसे आदमी दूंगा कि चाहे जान चली जाय मैदान से हटने वाले नहीं, इच्छा हो तो मेरे साथ चलो। अच्छी जगह है।

जंगी उसका ठाट-बाट देखकर रोब में आ गया। उसे कभी चमरौधे जूते भी मयस्सर न