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214 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


मालूम होती। उधर तो जंग की तैयारियां बड़े जोरों से हो रही हैं।'

‘राजा साहब को तो आप जानते ही हैं, झक्कड़ आदमी हैं, पूरे सनकी। कोई न कोई धुन उन पर सवार रहती है । आजकल यही धुन है कि रायसाहब को नीचा दिखाकर रहेंगे। और उन्हें जब एक धुन सवार हो जाती है, तो फिर किसी की नहीं सुनते, चाहे कितना ही नुकसान उठाना पड़े। कोई चालीस लाख का बोझ सिर पर है, फिर भी वही दम-खम है, वही अलल्ले तलल्ले खर्च हैं। पैसे को तो कुछ समझते ही नहीं। नौकरों का वेतन छ:-छ: महीने से बाकी पड़ा हुआ है, मगर हीरा महल बन रहा है। संगमरमर का तो फर्श है। पच्चीकारी ऐसी हो रही है कि आंखें नहीं ठहरतीं। अफसरों के पास रोज डालियां जाती रहती हैं। सुना है, कोई अंग्रेज मैनेजर रखने वाले हैं।'

'फिर आपने कैसे कह दिया था कि आप कोई समझौता करा देंगे?'

‘मुझसे जो कुछ हो सकता था, वह मैंने किया। इसके सिवा मैं और क्या कर सकता था? अगर कोई व्यक्ति अपने दो-चार लाख रुपये फूकने ही पर तुला हुआ हो, तो मेरा क्या बस? रायसाहब अब क्रोध न संभाल सके-खासकर जब उन दो-चार लाख रुपये में से दस-बीस हजार आपके हत्थे चढ़ने की भी आशा हो।

मिस्टर तंखा अब क्यों दबते? बोले-रायसाहब, साफ-साफ न कहलवाइए। यहां न मैं संन्यासी हूं, न आप। हम सभी कुछ न कुछ कमाने ही निकले हैं। आंख के अंधों और गाठ के पूरों की तलाश आपको भी उतनी ही है, जितनी मुझको। आपसे मैंने खड़े होने का प्रस्ताव किया। आप एक लाख के लोभ से खड़े हो गए, अगर गोटी लाल हो जाती, तो आज आप एक लाख के स्वामी होते और बिना एक पाई कर्ज लिए कुंवर साहब से संबंध भी हो जाता और मुकदमा भी दायर हो जाता, मगर आपके दुर्भाग्य से वह चाल पट पड़ गई। जब आप ही ठाठ पर गए, तो मुझे क्या मिलता। आखिर मैंने झख मारकर उनकी मूंछें पकड़ी। किसी किसी न तरह यह वैतरणी तो पार करनी ही है।

रायसाहब को ऐसा आवेश आ रहा था कि इस दुष्ट को गोली मार दें। इसी बदमाश ने सब्ज बाग दिखाकर उन्हें खड़ा किया और अब अपनी सफाई दे रहा है। पीठ में धूल भी न लगने देता, लेकिन परिस्थिति जबान बंद किए हुए थी।

'तो अब आपके किए कुछ नहीं हो सकता?'

'ऐसा ही समझिए।'

'मैं पचास हजार पर भी समझौता करने को तैयार हूं।'

'राजा साहब किसी तरह न मानेंगे।'

'पच्चीस हजार पर तो मान जायंगे?'

'कोई आशा नहीं। वह साफ कह चुके हैं।'

'वह कह चुके हैं या आप कह रहे हैं?'

'आप मुझे झूठा समझते हैं?'

रायसाहब ने विनम्र स्वर में कहा-मैं आपको झूठा नहीं समझता, लेकिन इतना जरूर समझता हूं कि आप चाहते, तो मुआमला हो जाता।

'तो आपका खयाल है, मैंने समझौता नहीं होने दिया?'

'नहीं, यह मेरा मतलब नहीं है। मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि आप चाहते तो काम