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220 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


मिस्टर खन्ना ने रायसाहब को दया और उपहास की दृष्टि से देखा, मानो कह रहे हो, कितने बड़े गधे हो तुम।

सहसा मेहता रायसाहब के गले लिपट गए और उन्मुक्त कंठ से बोले-थ्री चीयर्स फोर राय साहब, हिप-हिप हुर्रे।

खन्ना ने खिसियाकर कहा-यह लोग राजे-महाराजे ठहरे, यह इन कामों में दान न दे, तो कौन दे?

मेहता बोले-मैं तो आपको राजाओं का राजा समझता हूं। आप उन पर शासन करते हैं। उनकी चोटी आपके हाथ में है।

रायसाहब प्रसन्न हो गए-यह आपने बड़े मार्के की बात कही मेहताजी। हम नाम के राजा हैं। असली राजा तो हमारे बैंकर हैं।

मेहता ने खन्ना की खुशामद का पहलू अख्तियार किया-मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है खन्नाजी। आप अभी इस काम में नहीं शरीक होना चाहते, न सही, लेकिन कभी न कभी जरूर आयंगे। लक्ष्मीपतियों की बदौलत ही हमारी बड़ी-बड़ी संस्थाएं चलती हैं। राष्ट्रीय आंदोलन को दो-तीन साल तक किसने इतनी धूम-धाम से चलाया। इतनी धर्मशाले और पाठशाले कौन बनवा रहा है? आज संसार का शासन-सूत्र बैंकरों के हाथ में है। सरकारें उनके हाथ का खिलौना हैं। मैं भी आपसे निराश नहीं हूं। जो व्यक्ति राष्ट्र के लिए जेल जा सकता है, उसके लिए दो-चार हजार खर्च कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। हमने तय किया है, इस शाला का बुनियादी पत्थर गोविन्दी देवी के हाथों रखा जाए। हम दोनों शीघ्र ही गवर्नर साहब से भी मिलेंगे और मुझे विश्वास है, हमें उनकी सहायता मिल जायगी। लेडी विलसन का महिला-आंदोलन से कितना प्रेम है, आप जानते ही हैं। राजा साहब की और अन्य सज्जनों की भी राय थी कि लेडी विलसन से ही बुनियाद रखवाई जाए, लेकिन अंत में यह निश्चय हुआ कि यह शुभ कार्य किसी अपनी बहन के हाथों होना चाहिए। आप कम से कम उस अवसर पर आएंगे तो जरूर?

खन्ना ने उपहास किया-हां, जब लार्ड विलसन आयंगे तो मेरा पहुंचना जरूरी ही है। इस तरह आप बहुत-से रईसों को फांस लेंगे। आप लोगों को लटके खूब सूझते हैं। और हमारे रईस हैं भी इस लायक। उन्हें उल्लू बनाकर ही मूंड़ा जा सकता है।

'जब धन जरूरत से ज्यादा हो जाता है, तो अपने लिए निकास का मार्ग खोजता है। या न निकल पाएगा तो जुए में जाएगा, घुड़दौड़ में जायगा, ईट-पत्थर में जायगा, या ऐयाशी में जायगा।'

ग्यारह का अमल था खन्ना साहब के दफ्तर का समय आ गया। मेहता चले गए। रायसाहब भी उठे कि खन्ना ने उनका हाथ पकड़ बैठा लिया-नहीं, आप जरा बैठिए। आप देख रहे हैं, मेहता ने मुझे इस बुरी तरह फांसा है कि निकलने को कोई रास्ता ही नहीं रहा। गोविन्दी से बुनियाद का पत्थर रखवाएंगे। ऐसी दशा में मेरा अलग रहना हास्यास्पद है या नहीं? गोविन्दी कैसे राजी हो गई, मेरी समझ में नहीं आता और मालती ने कैसे उसे सहन कर लिया, यह समझना और भी कठिन है। आपका क्या खयाल है, इसमें कोई रहस्य है या नहीं?

रायसाहब ने आत्मीयता जताई-ऐसे मुआमले में स्त्री को हमेशा पुरुष से सलाह ले लेना