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228 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


पकड़े हुए , तो किसकी मजाल है कि उन्हें पथ-भ्रष्ट कह सके?

झिंगुरीसिंह ने कायल होकर कहा-मैंने तो भाई, जो सुना था, वह तुमसे कह दिया।

दातादीन ने महाभारत और पुराणों से ब्राह्मणों द्वारा अन्य जातियों की कन्याओं के ग्रहण किए जाने की एक लंबी सूची पेश की और यह सिद्ध कर दिया कि उनसे जो संतान हुई, वह ब्राह्मण कहलाई और आजकल के जो ब्राह्मण हैं, वह उन्हीं संतानों की संतान हैं। यह प्रथा आदिकाल से चली आई है और इसमें कोई लज्जा की बात नहीं।

झिंगुरीसिंह उनके पांडित्य पर मुग्ध होकर बोले-तब क्यों आजकल लोग वाजपेयी और सुकुल बने फिरते हैं?

'समय-समय की परथा है और क्या। किसी में उतना तेज तो हो। बिस खाकर उसे पचाना तो चाहिए। वह सतयुग की बात थी, सतयुग के साथ गई। अब तो अपना निबाह बिरादरी के साथ मिलकर रहने में है, मगर करूं क्या, कोई लड़की वाला आता ही नहीं। तुमसे भी कहा औरों से भी कहा, कोई नहीं सुनता तो मैं क्या लड़की बनाऊं?'

झिंगुरीसिंह ने डांटा-झूठ मत बोलो पंडित, दो आदमियों को फांस-फूंसकर लाया मगर तुम मुंह फैलाने लगे, तो दोनों कान खड़े करके निकल भागे। आखिर किस बिरते पर हजार पांच सौ मांगते हो तुम? दस बीघे खेत और भीख के सिवा तुम्हारे पास और है क्या?

दातादीन के अभिमान को चोट लगी। दाढ़ी पर हाथ फेरकर बोले-पास कुछ न सही मैं भीख ही मांगता हूं, लेकिन मैंने अपनी लड़कियों के ब्याह में पांच-पांच सौ दिए हैं फिर लड़के के लिए पांच सौ क्यों न मांगू? किसी ने सेंत-मेंत में मेरी लड़की ब्याह ली होती तो मैं भी सेंत में लड़का ब्याह लेता। रही हैसियत की बात। तुम जजमानी को भीख समझो मैं तो उसे जमींदारी समझता हूं, बंकघर। जमींदार मिट जाय, बंकबर टूट जाय, लेकिन जजमानी अंत तक बनी रहेगी। जब तक हिन्दू-जाति रहेगी तब तक बांमन भी रहेंगे और जजमानी भी रहेगी। सहालग में मजे से घर बैठे सौ-दो-सौ फटकार लेते हैं। कभी भाग लढ़ गया, तो चार पांच सौ मार लिया। कपड़े, बरतन, भोजन अलग। कहीं-न-कहीं नित ही कार पराजन पड़ा ही रहता है। कुछ मिले तब भी एक-दो थाल और दो-चार आने दक्षिणा के मिल ही जाते हैं। ऐसा चैन न जमींदारी में है, न साहूकारों में। और फिर मेरा तो सिलिया से जितना उबार हाल है, उतना ब्राह्मण की कन्या से क्या होगा? वह तो बहुरिया बनी बैठी रहेगी। बहुत होगा रोटियां पका देगी। यहां सिलिया अकेली तीन आदमियों का काम करती है। और मैं उस रोटी के सिवा और क्या देता हूं? बहुत हुआ, तो साल में एक धोती दे दी।

दूसरे पेड़ के नीच दातादीन का निजी पैरा था। चार बैलों से मंड़ाई हो रही थी। धन्ना चमार बैलों को हांक रहा था, सिलिया पैरे से अनाज निकाल निकालकर औसा रही थी और मातादीन दूसरी ओर बैठा अपनी लाठी में तेल मल रहा था।

सिलि.ा सांवली सलोनी, छरहरी बालिका थी, जो रूपवती न होकर भो आकर्षक थी। उसके हास में, चितवन में, अंगों के विलास में हर्ष का उन्माद था , जिससे उसकी बोटी बोटी नाचती रहती थी, सिर से पांव तक भूसे के अणुओं में सनी, पसीने से तर, सिर के बाल आधे खुले, वह दौड़-दौड़कर अनाज ओसा रही थी, मानो तन-मन से कोई खेल खेल रही हो।

मातादीन ने कहा-आज सांझ तक अनाज बाकी न रहे सिलिया। तू थक गई हो तो मैं आऊं?