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गोदान : 237
 


'और जो बोले?'

'तो मेरी जीभ काट लेना।'

'अच्छा तो जाओ, बर ठीक-ठाक करोमैं रुपये दे दूंगी।'

होरी ने सजल नेत्रों से दुलारी के पांव पकड़ लिए। भावावेश से मुंह बंद हो गया।

सहुआइन ने पांव खींचकर कहा-अब यही सरारत मुझे अच्छी नहीं लगती। मैं साल भर के भीतर अपने रुपये सूद-समेत कान पकड़कर लूंगी। तुम तो व्यवहार के ऐसे सच्चे नहीं हो, लेकिन धनिया पर मुझे विश्वास है। सुना पंडित तुमसे बहुत बिगड़े हुए हैं। कहते हैं इसे गांव से निकालकर नहीं छोड़ा तो बांभन नहीं। तुम सिलिया को निकाल बाहर क्यों नहीं करते? बैठे-बैठाए झगड़ा मोल ले लिया।

'धनिया उसे रखे हुए है, मैं क्या करूं?'

'सुना है, पंडित कासी गए थे। वहां एक बड़ा नामी विद्वान पंडित है। वह पांच सौ मांगता है। तय परासचित कराएगा? भला, पूछो ऐसा अंधेर कहीं हुआ है। जब धरम नस्ट हो गया तो एक नहीं, हजार परासचित करो, इससे क्या होता है। तुम्हारे हाथ का छुआ पानी कोई न पिएगा। चाहे जितना परासचित करो।'

होरी यहां से घर चला, तो उसका दिल उछल रहा था। जीवन में ऐसा सुखद अनुभव उसे न हुआ था। रास्ते में सोभा के घर गया और सगाई लेकर चलने के लिए नेवता दे आया। फिर दोनों दातादीन के पास सगाई की सायत पूछने गए। वहां से आकर द्वार पर सगाई की तैयारियों की सलाह करने लगे।

धनिया ने बाहर आकर कहा-पहर रात गई, अभी रोटी खाने की बेला नहीं आई? खाकर बैठो। गपड़चौथ करने को तो सारी रात पड़ी है।

होरी ने उसे भी परामर्श में शरीक होने का अनुरोध करते हुए कहा-इसी सहालग में लगन ठीक हुआ है। बता, क्या-क्या सामान लाना चाहिए? मुझे तो कुछ मालूम नहीं।

'जब कुछ मालूम ही नहीं, तो सलाह करने क्या बैठे हो? रुपये-पैसे का डौल भी हुआ कि मन में मिठाई खा रहे हो?'

होरी ने गर्व से कहा-तुझे इससे क्या मतलब? तू इतना बता दे, क्या-क्या सामान लाना होगा?

'तो मैं ऐसी मन की मिठाई नहीं खाती।'

'तू इतना बता दे कि हमारी बहनों के ब्याह में क्या-क्या सामान आया था?'

'पहले यह बता दो, रुपये मिल गए।'

'हां मिल गये, और नहीं क्या भंग खायी है।'

'तो पहले चलकर खा लो। फिर सलाह करेंगे।'

मगर जब उसने सुना कि दुलारी से बातचीत हुई है, तो नाक सिकोड़कर बोली-उससे रुपये लेकर आज तक कोई उरिन हुआ है? चुडैल कितना कसकर सूद लेती है।

'लेकिन करता क्या? दूसरा देता कौन है?'

'यह क्यों नहीं कहते कि इसी बहाने दो गाल हंसने-बोलने गया था। बूढ़े हो गए, पर यह बान न गई।'

'तू तो धनिया, कभी-कभी बच्चों की-सी बातें करने लगती है। मेरे-जैसे फटेहालों से