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गोदान : 25
 

धनिया के मुख पर स्निग्धता झलक पड़ी। 'मन भाय मुड़िया हिलाये' वाले भाव से बोली -- मैं उनके बखान की भूखी नहीं हूँ, अपना बखान धरे रहें।
होरी ने स्नेह-भरी मुस्कान के साथ कहा -- मैंने तो कह दिया, भैया, वह नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती, गालियों से बात करती है; लेकिन वह यही कहे जाय कि वह औरत नहीं लक्ष्मी है। बात यह है कि उसकी घरवाली जबान की बड़ी तेज़ थी। बेचारा उसके डर के मारे भागा-भागा फिरता था। कहता था, जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुँह सबेरे देख लेता हूँ, उस दिन कुछ-न-कुछ जरूर हाथ लगता है। मैंने कहा -- तुम्हारे हाथ लगता होगा, यहाँ तो रोज़ देखते हैं, कभी पैसे से भेंट नहीं होती।
'तुम्हारे भाग ही खोटे हैं, तो मैं क्या करूँ।'
'लगा अपनी घरवाली की बुराई करने -- भिखारी को भीख तक नहीं देती थी, झाड़ू लेकर मारने दौड़ती थी, लालचिन ऐसी थी कि नमक तक दूसरों के घर से माँग लाती थी ।'
'मरने पर किसी की क्या बुराई करूँ। मुझे देखकर जल उठती थी।'
'भोला बड़ा गमखोर था कि उसके साथ निबाह कर दिया। दूसरा होता तो जहर खाके मर जाता। मुझसे दस साल बड़े होंगे भोला; पर राम-राम पहले ही करते हैं।'
'तो क्या कहते थे कि जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुँह देख लेता हूँ, तो क्या होता है?'
'उस दिन भगवान् कहीं-न-कहीं से कुछ भेज देते हैं।'
'बहुएँ भी तो वैसी ही चटोरिन आयी हैं। अबकी सबों ने दो रुपए के ख़रबूज़े उधार खा डाले। उधार मिल जाय, फिर उन्हें चिन्ता नहीं होती कि देना पड़ेगा या नहीं।'
'और भोला रोते काहे को हैं?
गोबर आकर बोला -- भोला दादा आ पहुँचे। मन दो मन भूसा है वह उन्हें दे दो, फिर उनकी सगाई ढूँढ़ने निकलो।
धनिया ने समझाया -- आदमी द्वार पर बैठा है उसके लिए खाट-वाट तो डाल नहीं दी, ऊपर से लगे भुनभुनाने। कुछ तो भलमनसी सीखो। कलसा ले जाओ, पानी भरकर रख दो, हाथ-मुँह धोयें, कुछ रस-पानी पिला दो। मुसीबत में ही आदमी दूसरों के सामने हाथ फैलाता है।
होरी बोला -- रस-वस का काम नहीं है, कौन कोई पाहुने हैं।
धनिया बिगड़ी -- पाहुने और कैसे होते हैं। रोज-रोज तो तुम्हारे द्वार पर नहीं आते? इतनी दूर से धूप-घाम में आये हैं, प्यास लगी ही होगी। रुपिया, देख डब्बे में तमाखू है कि नहीं, गोबर के मारे काहे को बची होगी। दौड़कर एक पैसे का तमाखू सहुआइन की दुकान से ले ले।
भोला की आज जितनी खातिर हुई, और कभी न हुई होगी। गोबर ने खाट डाल दी, सोना रस घोल लायी, रूपा तमाखू भर लायी। धनिया द्वार पर किवाड़ की आड़ में खड़ी अपने कानों से अपना बखान सुनने के लिए अधीर हो रही थी।
भोला ने चिलम हाथ में लेकर कहा -- अच्छी घरनी घर में आ जाय, तो समझ लो लक्ष्मी आ गयी। वही जानती है छोटे-बड़े का आदर-सत्कार कैसे करना चाहिए।
धनिया के हृदय में उल्लास का कम्पन हो रहा था। चिन्ता और निराशा और अभाव से आहत आत्मा इन शब्दों में एक कोमल शीतल स्पर्श का अनुभव कर रही थी।