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26 : प्रेमचंद रचनावली-6
 

होरी जब भोला का खांचा उठाकर भूसा लाने अन्दर चला, तो धनिया भी पीछे-पीछे चली। होरी ने कहा -- जाने कहाँ से इतना बड़ा खाँचा मिल गया। किसी भड़भूजे से माँग लिया होगा। मन-भर से कम में न भरेगा। दो खाँचे भी दिये, तो दो मन निकल जायंगे।
धनिया फूली हुई थी। मलामत की आँखों से देखती हुई बोली -- या तो किसी को नेवता न दो, और दो तो भरपेट खिलाओ। तुम्हारे पास फूल-पत्र लेने थोड़े ही आये हैं कि चँगेरी लेकर चलते। देते ही हो, तो तीन खाँचे दे दो। भला आदमी लड़कों को क्यों नहीं लाया। अकेले कहाँ तक ढोयेगा। जान निकल जायगी।
'तीन खाँचे तो मेरे दिये न दिये जायँगे !'
'तब क्या एक खाँचा देकर टालोगे? गोबर से कह दो, अपना खाँचा भरकर उनके साथ चला जाय।'
'गोबर ऊख गोड़ने जा रहा है।'
'एक दिन न गोड़ने से ऊख न सूख जायगी।'
'यह तो उनका काम था कि किसी को अपने साथ ले लेते। भगवान् के दिये दो-दो बेटे हैं।'
'न होंगे घर पर। दूध लेकर बाजार गए होंगे।'
'यह तो अच्छी दिल्लगी है कि अपना माल भी दो और उसे घर तक पहुँचा भी दो। लाद दे, लदा दे, लादनेवाला साथ कर दे।'
'अच्छा भाई, कोई मत जाय। मैं पहुँचा दूँगी। बड़ों की सेवा करने में लाज नहीं है।'
'और तीन खाँचे उन्हें दे दूँ, तो अपने बैल क्या खाएंगे?'
'यह सब तो नेवता देने के पहले ही सोच लेना था। न हो, तुम और गोबर दोनों जने चले जाओ।'
'मुरौवत मुरौवत की तरह की जाती है, अपना घर उठाकर नहीं दे दिया जाता।'
'अभी जमींदार का प्यादा आ जाय, तो अपने सिर पर भूसा लादकर पहुँचाओगे तुम, तुम्हारा लड़का, लड़की सब। और वहाँ साइत मन-दो-मन लकड़ी भी फाड़नी पड़े।'
'ज़मींदार की बात और है।'
'हाँ, वह डंडे के जोर से काम लेता है न।'
'उसके खेत नहीं जोतते?'
'खेत जोतते हैं, तो लगान नहीं देते?'
'अच्छा भाई, जान न खा, हम दोनों चले जायंगे। कहाँ-से-कहाँ मैंने इन्हें भूसा देने को कह दिया। या तो चलेगी नहीं, या चलेगी तो दौड़ने लगेगी।'
तीनों खांचे भूसे से भर दिये गये। गोबर कुढ़ रहा था। उसे अपने बाप के व्यवहारों में जरा भी विश्वास न था। वह समझता था, यह जहाँ जाते हैं, वहीं कुछ-न-कुछ घर से खो आते हैं। धनिया प्रसन्न थी। रहा होरी, वह धर्म और स्वार्थ के बीच में डूब-उतरा रहा था।
होरी और गोबर मिलकर एक खांचा बाहर लाये। भोला ने तुरन्त अपने-अंगौछे का बीड़ा बनाकर सिर पर रखते हुए कहा -- मैं इसे रखकर अभी भागा आता हूँ। एक खांचा और लूंगा।