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280 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


होरी की स्मृति जाग उठी। पहचाना और पटेश्वरी के घर की ओर कुरसियां लाने चला।

मेहता ने कहा-कुरसियों का कोई काम नहीं। हम लोग इसी खाट पर बैठे जाते हैं। यहां कुरसी पर बैठने नहीं, तुमसे कुछ सीखने आए हैं।

दोनों खाट पर बैठे। होरी हतबुद्धि-सा खड़ा था। इन लोगों की क्या खातिर करे! बड़े-बड़े आदमी हैं। उनकी खातिर करने लायक उसके पास है ही क्या?

आखिर उसने पूछा-पानी लाऊं?

मेहता ने कहा-हां, प्यास तो लगी है।

'कुछ मीठा भी लेता आऊं?'

'लाओ, अगर घर में हो।'

होरी घर में मीठा और पानी लेने गया तब तक गांव के बालकों ने आकर इन दोनों आदमियों को घेर लिया और लगे निरखने, मानो चिड़ियाघर के अनोखे जंतु आ गए हों।

सिल्लो बच्चे को लिए किसी काम से चली जा रही थी? इन दोनों आदमियों को देखकर कौतूहलवश ठिठक गई।

मालती ने आकर उसके बच्चे को गोद में ले लिया और प्यार करती हुई बोली-कितने दिनों का है?

सिल्लो को ठीक न मालूम था। एक दूसरी औरत ने बताया-कोई साल भर का होगा, क्यों री?

सिल्लो ने समर्थन किया।

मालती ने विनोद किया-प्यारा बच्चा है। इसे हमें दे दो।

सिल्लो ने गर्व से फूलकर कहा-आप ही का तो है।

'तो मैं इसे ले जाऊं?'

'ले जाइए। आपके साथ रहकर आदमी हो जायगा।'

गांव की और महिलाएं आ गईं और मालती को होरी के घर में ले गईं। यहां मरदों के सामने मालती से वार्तालाप करने का अवसर उन्हें न मिलता। मालती ने देखा, खाट बिछी है, और उस पर एक दरी पड़ी हुई है, जो पटेश्वरी के घर से मांगकर आई थी, मालती जाकर बैठी। संतान-रक्षा और शिशु-पालन की बातें होने लगीं। औरतें मन लगाकर सुनती रहीं।

धनिया ने कहा-यहां यह सब सफाई और संजम कैसे होगा सरकार। भोजन तक का ठिकाना तो है नहीं।

मालती ने समझाया-सफाई में कुल खर्च नहीं केवल थोड़ी-सी मेहनत और होशियारी से काम चल सकता है।

दुलारी सहुआइन ने पूछा-यह सारी बातें तुम्हें कैसे मालूम हुईं सरकार, आपका तो अभी ब्याह ही नहीं हुआ?

मालती ने मुस्कराकर पूछा-तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मेरा ब्याह नहीं हुआ है?

सभी स्त्रियां मुह फेरकर मुस्कराईं। पुनिया बोली-भला, यह भी छिपा रहता है, मिस साहब, मुंह देखते ही पता चल जाता है।

मालती ने झेंपते हुए कहा-इसलिए ब्याह नहीं किया कि आप लोगों की सेवा कैसे करती!