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298 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


उनका खयाल था कि मुख्यतः मन के संस्कार और भोग-लालसा ही औरतों को इस ओर खींचती है। इसी बात पर दोनों मित्रों में बहस छिड़ गई। दोनों अपने-अपने पक्ष पर अड़ गए।

मेहता ने मुट्ठी बांधकर हवा में पटकते हुए कहा-आपने इस प्रश्न पर ठंडे दिल से गौर नहीं किया। रोजी के लिए और बहुत से जरिए हैं। मगर ऐश की भूख रोटियों से नहीं जाती। उसके लिए दुनिया के अच्छे-से-अच्छे पदार्थ चाहिए। जब तक समाज की व्यवस्था ऊपर से नीचे तक बदल न डाली जाय, इस तरह की मंडली से कोई फायदा न होगा।

मिर्जा ने मूंछें खड़ी कीं-और मैं कहता हूं कि यह महज रोजी का सवाल है। हां, यह सवाल सभी आदमियों के लिए एक-सा नहीं हैं। मजदूर के लिए वह महज आटे-दाल और एक फूस की झोंपड़ी का सवाल है। एक वकील के लिए वह एक कार और बंगले और खिदमतगारों का सवाल है। आदमी महज रोटी नहीं चाहता और भी बहुत-सी चीजें चाहता है। अगर औरतों के सामने भी वह प्रश्न तरह-तरह की सूरतों में आता है तो उनका क्या कसूर?

डाक्टर मेहता अगर जरा गौर करते, तो उन्हें मालूम होता कि उनमें और मिर्जा में कोई भेद नहीं, केवल शब्दों का हेर-फेर है, पर बहस की गर्मी में गौर करने का धैर्य कहां? गर्म होकर बोले-मुआफ कीजिए, मिर्जा साहब, जब तक दुनिया में दौलत वाले रहेंगे, वेश्याएं भी रहेंगी। आपकी मंडली अगर सफल भी हो जाए, हालांकि मुझे उसमें बहुत संदेह है, तो आप दस-पांच औरतों से ज्यादा उनमें कभी न ले सकेंगे, और वह भी थोड़े दिनों के लिए। सभी औरतों में नाट्य करने की शक्ति नहीं होती, उसी तरह जैसे सभी आदमी कवि नहीं हो सकते। और यह भी मान लें कि वेश्याएं आपकी मंडली में स्थायी रूप से टिक जायंगी, तो भी बाजार में उनकी जगह खाली न रहेगी। जड़ पर जब तक कुल्हाडे़ न चलेंगे, पत्तियां तोड़ने से कोई नतीजा नहीं। दौलत वालों में कभी-कभी ऐसे लोगों निकल आते हैं, जो सब कुछ त्यागकर खुदा की याद में जा बैठते हैं, मगर दौलत का राज्य बदस्तूर कायम है। उसमें जरा भी कमजोरी नहीं आने पाई।

मिर्जा को मेहता की हठधर्मी पर दु:ख हुआ। इतना पढ़ा-लिखा विचारवान् आदमी इस तरह की बातें करे। समाज की व्यवस्था क्या आसानी से बदल जाएगी? वह तो सदियों का मुआमला है। तब तक क्या यह अनर्थ होने दिया जाय? उसकी रोकथाम न की जाय, इन अबलाओं को मर्दों की लिप्सा का शिकार होने दिया जाय? क्यों न शेर को पिंजरे में बंद कर दिया जाए कि वह दांत और नाखून होते हुए भी किसी को हानि न पहुंचा सके? क्या उस वक्त तक चुपचाप बैठा रहा जाए, जब तक शेर अहिंसा का व्रत न ले ले? दौलत वाले और जिस तरह चाहें अपनी दौलत उड़ाएं मिर्जा को गम नहीं। शराब में डूब जाएं, कारों की माला गले में डाल लें, किले बनवाएं, धर्मशाले और मस्जिदें खड़ी करें, उन्हें कोई परवा नहीं। अबलाओं की जिंदगी न खराब करें। यह मिर्जाजी नहीं देख सकते। वह रूप के बाजार को ऐसा खाली कर देंगे कि दौलत वालों की अशर्फियों पर कोई थूकनेवाला भी न मिले। क्या जिन दिनों शराब की दुकानों की पिकेटिंग होती थी, अच्छे-अच्छे शराबी पानी पी-पीकर दिल की आग नहीं बुझाते थे?

मेहता ने मिर्जा की बेवकूफी पर हंसकर कहा-आपको मालूम होना चाहिए कि दुनिया में ऐसे मुल्क भी हैं, जहां वेश्याएं नहीं हैं। मगर अमीरों की दौलत वहां भी दिलचस्पियों के सामान पैदा कर लेती है।