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34 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


उसने तो बहू को छुआ भी नहीं। क्या वह इतना गँवार है कि महतो के घर की औरतों पर हाथ उठाएगा?
होरी ने अविश्वास करके कहा -- आंखों में धूल मत झोंको चौधरी, तुमने कुछ कहा नहीं, तो बहू झूठ-मूठ रोती है? रुपए की गर्मी है, तो वह निकाल दी जायगी। अलग हैं तो क्या हुआ, हैं तो एक खून। कोई तिरछी आंख से देखे, तो आंख निकाल लें।
पुन्नी चंडी बनी हुई थी। गला फाड़कर बोली -- तूने मुझे धक्का देकर गिरा नहीं दिया? खा जा अपने बेटे की कसम।
हीरा को भी खबर मिली कि चौधरी और पुनिया में लड़ाई हो रही है। चौधरी ने पुनिया को धक्का दिया। पुनिया ने उसे तल्लियों से पीटा। उसने पुर वहीं छोड़ा और औंगी लिए घटनास्थल की ओर चला। गाँव में अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध था। छोटा डील, गठा हुआ शरीर, आंखें कौड़ी की तरह निकल आयी थीं और गर्दन की नसें तन गई थीं; मगर उसे चौधरी पर क्रोध न था, क्रोध था पुनिया पर। वह क्यों चौधरी से लड़ी? क्यों उसकी इज्जत मिट्टी में मिला दी? बंसोर से लड़ने-झगड़ने का उसे क्या प्रयोजन था? उसे जाकर हीरा से सारा समाचार कह देना चाहिए था। हीरा जैसा उचित समझता, करता। वह उससे लड़ने क्यों गई ? उसका बस होता, तो वह पुनिया को पर्दे में रखता। पुनिया किसी बड़े से मुंह खोलकर बातें करे, यह उसे असह्य था। वह खुद जितना उद्दंड था, पुनिया को उतना ही शांत रखना चाहता था। जब भैया ने पन्द्रह रुपये में सौदा कर लिया, तो यह बीच में कूदनेवाली कौन।
आते ही उसने पुन्नी का हाथ पकड़ लिया और घसीटता हुआ अलग ले जाकर लगा लातें जमाने -- हरामज़ादी, तू हमारी नाक कटाने पर लगी हुई है। तू छोटे-छोटे आदमियों से लड़ती फिरती है, किसकी पगड़ी नीची होती है बता । ( एक लात और जमाकर) हम तो वहां कलेऊ की बाट देख रहे हैं, तू यहां लड़ाई ठाने बैठी है। इतनी बेसर्मी! आंख का पानी ऐसा गिर गया। खोदकर गाड़ दूँगा।
पुन्नी हाय-हाय करती जाती थी और कोसती जाती थी, 'तेरी मिट्टी उठे, तुझे हैजा हो जाय, तुझे मरी आवें, देवी मैया तुझे लील जायं , तुझे इन्फ्लुएंजा हो जाय। भगवान् करे, तू कोढ़ी हो जाय। हाथ-पाँव कट-कट गिरें।'
और गालिया तो हीरा खड़ा-खड़ा सुनता रहा, लेकिन यह पिछली गाली उसे लग गई । हैजा , मरी आदि में विशेष कष्ट न था। इधर बीमार पड़े, उधर विदा हो गये, लेकिन कोढ़। यह घिनौनी मौत, और उससे भी घिनौना जीवन। वह तिलमिला उठा, दांत पीसता हुआ फिर पुनिया पर झपटा और झोटे पकड़कर फिर उसका सिर जमीन पर रगड़ता हुआ बोला-हाथ-पांव कटकर गिर जायंगे, तो मैं तुझे लेकर चाटूँगा। तू ही मेरे बाल-बच्चों को पालेगी? ऐं! तू ही इतनी बड़ी गिरस्ती चलाएगी? तू तो दूसरा भरतार करके किनारे खड़ी हो जायगी।
चौधरी को पुनिया की इस दुर्गति पर दया आ गई। हीरा को उदारतापूर्वक समझाने लगा -- हीरा महतो, अब जाने दो, बहुत हुआ। क्या हुआ, बहू ने मुझे मारा। मैं तो छोटा नहीं हो गया। धन्य भाग कि भगवान् ने यह दिन तो दिखाया।

हीरा ने चौधरी को डांटा -- तुम चुप रहो चौधरी, नहीं मेरे क्रोध में पड़ जाओगे तो बुरा होगा। औरत जात इसी तरह बहकती है। आज को तुमसे लड़ गई , कल को दूसरों से लड़ जायगी।