पृष्ठ:गोदान.pdf/३५४

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354 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


में होते। मैं न जानता था तुम इतने भावुक हो। -उन्हें पागलखाने भेजना इतना आसान नहीं जितना तुम समझते हो। और इसकी कोई जरूरत भी तो नहीं हम यह साबित करना चाहते हैं कि जिस वक्त बैनामा हुआ वह अपने होश हवास में न थे। इसके लिए शहादतों की जरूरत है। वह अब भी उसी दशा में हैं इसे साबित करने के लिए डाक्टर चाहिए और मि• कामत भी यह लिखने का साहस नहीं रखते देवकुमार को धमकियों से झुकाना तो असंभव था मगर तर्क के सामने उनकी गर्दन आपही-आष झुक जाती थी। इन दिनों वह यही सोचते रहते थे कि संसार की कुव्यवस्था क्यों है? कर्म और संस्कार का अश्रय लेकर वह कहीं न पहुंच पाते थे। सर्वात्मवाद से भी उनकी गुत्थी न सुलझती थी। अगर सारा विश्व एकात्म है तो फिर यह भेद क्यों है? क्यों एक आदमी जिंदगी -भर बड़ी-से- बड़ी मेहनत करके भी भूखों मरता है, और दूसरा आदमी हाथ-पांव न हिलाने पर भी फूलों की सेज पर सोता है। यह सर्वोत्प है या घोर अनात्म? वृद्धि जवाब देती-यहां सभी स्वाधीन हैं, सभी को अपनी शक्ति और सा धना के हिसाब से उन्नत करने का अवसर है। मगर शंका पूछती - सबको समान अवसर कहां हैं? बाजार लगा हुआ है। जो चाहे वहां से अपनी इच्छा की चीज खरीद सकता हैं। मगर खरीदेगा तो वही जिसके पास पैसे हैं। और जब सब पास पैसे नहीं हैं तो सबका बराबर का अधिकार कैसे मना जाय? इस तरह का आत्ममंथन उनके जीवन में कभी न हुआ था। उनकी साहित्यिक बु. ऐसी व्यवस्था से संतुष्ट तो हो ही न सकती थी, पर उनके सामने ऐसी कोई गुत्थी न पो थी जो इस प्रश्न को वैयक्तिके अंत तक ले जातो इस वक्त अनकी दशा उस आदमी क। सी थी जो रोज मार्ग में ईटें पड़े देखता हैं और बचकर निकल जाता है। रात व निन लग? को ठोकर लगती होगी कितनों के हाथ-पैर टूटने होंगे, इसका ध्यान उस नई अता" एक दिन जब वह खुद रात को ठोकर खाकर अपने घुटने पट्टे नेता है तो उनकी किताब शक्ति हठ करने लगती है और वह उस सारे ढेर को मार्ग से हटाने पर तैयार हो जाता देवकुमार को बढी ठोकर लगी थी। कहां है न्याय कहां हैं? एवं गरीब आदमी किसी रार से बातें तोचकर खा लेना है, कानून उसे सजा देता है। इमरा अमीर आदमी दिन दहाड़े इस को लूटता है और उसे पदवी मिन्नती है, सम्मान मिलता है। कुछ आदमी तरह तरह के नियम बांधकर आते हैं और निरीह, दुर्बल मजदूरों पर आतंक बनाकर अपना गुलाम बना तलने के लगान और टैक्स और महल और किनने ही नामों से उसे लटना शुरू करते हैं, आर आ बावा वेतन 7त है, शकार खेलते हैं, नाचते हैं, रंगरलिया मनाते हैं। यह है ईश्वन का रचा हुआ संसार? यही न्याय है

हां, देवता हमेशा रहेंगे और हमेशा रहे हैं। उन्हें अब भी सखार धर्म और नीति पर चर हुआ नजर आता है। वे अपने जीवन की आहुति देकर संसार से विदा हो जाते हैं। लेकिन उन्न देवता क्यों कह?कया , स्वार्थो कहा, भनभनेत्री कहा देवता वह है जो न्याय की मा कर और इसके लिए प्राण दे दे। अगर वह जानकर अनजान बनना है से है। अगर ती भम गिरता उसकी आंतों में यह कुयवस्था चटकती ही नहीं तो वह अंधा भी है और मूर्ख भी देवता । तरह नहीं और यहां देवता बनने की जरूरत भी नहीं देवन औों ने ही भाग्य और ईश्वर से भक्ति को मिथ्याएं फैलाकर इस अनोनि को अमर बनाया है। मनुष्य ने अब तक इसका । कर दिया होता या समाज का ही अंत कर दिया होता जो इस दशा में जिंदा रहने से जहां से किए।