पृष्ठ:गोदान.pdf/३५५

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मंगलसूत्र : 355
 


होता। नहींमनुष्यों में मनुष्य बनना पड़ेगा। दरिंदों के बीच में सनम नड़ने के लिए हथियार बांधना पटे!। उनके का शिकार बनना चंबापन नहीं, जूझता है। आज जो इनने टाःनुकदार और राजे । हैं वह अपने पूर्वजों की लूट का ही आनंद तो उठा रहे हैं। और क्या उन्होंने जगह 'जायदान बेच कर पागलपन नहीं किया? पितरों को पिंडा देने लिए गया आकर पिंडा दना और यहां आकर हजारों रुपये खर्च करना क्या जरूरी था और रातों को मित्रों के साथ मुज सुनना और नाटक मंडली रट्रोलकर हजारों रुपये उसमें डाना अनिवयं था? वह अवश्यू पगनएन था। उन्हें क्यों अपने बाल बच्चों की निन्दा नहीं हुई? अगर उन्हें मुफ्त की संपत्ति मिली और उन्होंने उड़ाया तो उनके लड़के क्यों न मुफ्त की संपनि भाग ? अगर वह जान अं। उमग की नहा रा स ला न लड़न क्या तपस्या कर !

और अंत में उनकी शंकाओं को इस धारणा से तस्क्रीन हुई कि इस अनीति भरे संसार में धर्म अधर्म का विचार गलन है, अन्मयान है। और जुआ खेलकर या दूसरों के लोभ और आसक्त से फायदा टाकर संपत्ति खड़ी करना शुनना ही दुग या अा है जितना कानूनी दांव-पेंच से।णेश वंद महाजन के बीस हजार के कर्जदा हैं।नीति | कहना है कि उस जायदाद को बेचकर गके बीस हजार दे दिये जायं। क्री उन्हें मिल जायअगर कान कर्जदारों के साथ इतना न्याय भी भे नहीं करता तो कर्जदार कानून में जितनी रचतान हो सकें करके महजन से अपना व वापस लेने की चं' ट रने भ , न से धर्म का दोषी नहीं ठहर सकतीइस -417द निष्कर्ष पर होने शास्त्र और नीति के हरेक पट्टन में विचार किया और वह उनके मन में जभ । अब किसी तरह नहीं हिल के नाऔर अदृदि इससे उनके चिर- संचित संस्कारों गया। की आघात लगता था, पर वह एम प्रमन्द और पहने हुए थे माना उन्हें कोई नया जीवन में त्र मिल गया था।

क दिन उन्होंने संड गिधर दास के पास जाकर संप-साफ कह दिया- अगर आप मरी जायदाद वाप१ न कर ता भर ाTपद ऊ ' , वा कर।

गिरधर दाम नये जमाने व आगदन ११ अंग्रेजी में कुशल कानून में चतुर, राजनीति में में भाग लेने वाले , कानों में हिम्स लेते 4. और । 7र अच्ा देन जैचदत थ, एक शक्कर : मन खुद चलात थसार कगार अगर ज" ढ़ग बने थे। उनक यंता संट मक्कृलान भा यही सब करन थे, पर पूजा- पाल, दान -दक्षिण से प्रायश्चित करने रहते थे, गिरधर दास पक्के जवादी थे. हरेक काम व्यापार के वायदे से करते थे: कर्मचारियों का वेतन पहली तारीख को देते थे, मगर बोन में किसी को जरूरत पड़े तो खुद पर रुपये देते थे. मक्कलान जो रान साल भर वेतन न देते थे पर कर्मचारियों को बरबर पेशगी देते रहते थे।हिसाब होने पर उनको कुछ देने के बदले कुछ मिल जाता था। मक्कलात्न सन में द!-च ' बार अमरों का सलाम करने जाते थे. डालियां देते थे. जूते उतार कर कमरे में जाते थे और हाथ बांधे खड़े रहते थे। चलते वक्त आदमियों को दो-चार रुपये इनाम दे आते थे?गिरधर दास म्युनिसिपल कमिश्नर थे, सूट-बूट पहन कर अफसरों के पास जाते थे। को बराबरी का व्यवहार कर: ५.और आदमियों के साथ केवल इतनी रिआयत करते थे कि त्योहारों में त्योहारी दे देते थे, वह भी खूब खुशामद करा का अपने हकों के लिए लड़ना और आंदोलन करना जानते थे.मगर उन्हें ठगना असंभव

दकुमार का कथन यह सुनकर चकरा गये। उनकी बड़ी इज्जत करते थे। उनकी कई