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358: प्रेमचंद रचनावली-6
 

-यहां क्यों, सिविल लाइन्स में बनवायेंगे।

-अंदाज से कितने दिन में फैसला हो जायगा?

- छ: महीने के अंदर।

- बाबू जी के नाम से सरस्वती मंदिर बनवायेंगे।

मगर समस्या भी रुपये कहां से। देवकुमार निस्पृह आदमी थे। धन की कभी उपासना नहीं की। कभी इतना ज्यादा मिला ही नहीं कि संचय करते। किसी महीने में पचास जमा होते तो दूसरे महीने में खर्च हो जाते। अपनी सारी पुस्तकों का कॉपीराइट बेचकर उन्हें पांच हजार मिले थे। वह उन्होंने पंकजा के विवाह के लिए रख दिए थे1 अब ऐसी कोई सूरत नहीं थी जहां से कोई बड़ी रकम मिलती। उन्होंने समझा था सन्तकुमार घर का खर्च रा लगा और वह कुछ दिन आराम से बैठेगे या घूमेंगे। लेकिन इतना बड़ा मंसूबा बांधकर वन अब शांत से बैठ सकते हैं? उनके भक्तों की काफी तादाद भी दो- चार राजे भी अन भक्तों में थे जिनकी यह पुरानी लालसा थी कि देवकुमार जो उनके घर को अपने चणों से पबिन्न करें और वह अपनी 4. या उनके चरणों में अपण करेंमगर देवकुमार थे कि कभी किसी दरार में कदम नहीं रत्रा, अवं अपने प्रेमियों और भक्तों से अधिक संकट का रोना रो रहे थे और टुन्ने शब्दों में सहायता की याचना कर रहे थे। वह अत्मगौरव जैसे किसी कत्र म सा गया हा।

और शीघ्र ही इसका परणाम निकलाएक भवन में प्रस्ताव किया कि देवकुमार जी की साठवों सल्लगरह धाम से मनाई जाय और उन्हें साहित्य प्रेमियों की ओर से एक सैन्नी भेंट की जाध! क्या यह नजा भर दुख की बात नहीं है कि जिम महारथी में अपने जीवन के चालीस वर्ष साहित्य , सत्रा पर अर्पण कर दिएवह इस वृद्धावस्था में भी आर्थिक - चिंताओं से मुक्त न हो? मगहिन्य ग्र न फल फूल सनाजब तक हम अपने ग्ग़ाहित्य मंचयों का ठोस सत्कार करना.न मोहेंग, स्मृषि की उन्नति न करेगा, और दरें समाचारपत्रों मन जह से इसका सर्धन कियाअचरज की बात यह थी कि वह नानुभाव भी जिनका देवर से पुराना साहित्यिक वैमनम्ध था, भी इस अवसर पर उदारता का परिचय देने में। वाले चल पड़ी' क कमे बन गई। एक गज़ा महत्र के प्रधान बन गये। मि सिन्हा ने भी देवकुमार की कोई पुस्तक न पढ़ो थी पर वह इस आंदोलन में प्रमुग्व भाग लेने थेमिस कान और मिस पन्सि की अश में गन या मटिा आंके को पस्त्रों से पीछे न रहना चाहिए। जेट में निधन हुई नगर के इंटरमीडिएट कॉल ज़ में इस त्प की खाग्यिा हांन लगा।

अगर वह न३ आ गयी। आज शाम को वह अतएव होगा। दूर दूर से सहल्य प्रेमी आए हैं, कोई क अभ भाढ़ व थैली भेंट करेंगे। अश से ज्यादा सज्जन जमा ! गए हैं। न्या"यान होंगे, गान होगा, ड्रामा खेला जायगा, प्रीति भोज होगा, कवि सम्मान होगा। शहर में दीवारों पर पोस्टर लगे हुए हैं। सभ्य -समाज में अच्छी हलचन है। राजा साहब सभापति हैं।

देवकुमार को तमा बनने से नफरत थी। पब्लिक जन्नसों में भी कम आते जाते थे। लेकिन आज नो वरात का इल्ज़ा बनना ही पड़ा।ज्यों- ईयों सभा में जाने का समय समीप अला था उनके मन पर एक तरह का अवसाद छथा जाता था। जिस बकत थैली उनको ट थे।