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40 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


कि इस गाय के आने से उसे इतना आनंद नहीं हुआ कि ईर्ष्यालु भगवान् सुख का पलड़ा ऊंचा करने के लिए कोई नई विपत्ति भेज दें।

वह अभी आटा घोल ही रही थी कि गोबर गाय को लिए बालकों के एक जुलूस के साथ द्वार पर आ पहुंचा। होरी दौड़कर गाय के गले से लिपट गया। धनिया ने आटा छोड़ दिया और जल्दी से एक पुरानी साड़ी का काला किनारा फाड़कर गाय के गले में बांध दिया।

होरी श्रद्धा-विह्वल नेत्रों से गाय को देख रहा था, मानो साक्षात् देवीजी ने घर में पदार्पण किया हो। आज भगवान् ने यह दिन दिखाया कि उसका घर गऊ के चरणों से पवित्र हो गया। यह सौभाग्य। न जाने किसके पुण्य-प्रताप से।

धनिया ने भयातुर होकर कहा-खड़े क्या हो, आंगन में नांद गाड़ दो।

'आंगन में जगह कहां है?'

‘बहुत जगह है।'

'मैं तो बाहर ही गाड़ता हूं।'

'पागल न बनो। गांव का हाल जानकर भी अनजान बनते हो।'

'अरे, बित्ते-भर के आंगन में गाय कहां बंधेगी भाई?'

'जो बात नहीं जानते, उसमें टांग मत अड़ाया करो। संसार-भर की विद्दा तुम्हीं नहीं पढ़े हो ।'

होरी सचमुच आपे में न था। गऊ उसके लिए केवल भक्ति और श्रद्धा की वस्तु नहीं, सजीव संपत्ति थी वह उससे अपने द्वार की शोभा और अपने घर का गौरव बढ़ाना चाहता था। वह चाहता था, लोग गाय को द्वार पर बंधे देखकर पूछें-यह किसका घर है? लोग कहें-होरी महतो का। तभी लड़की वाले भी उसकी विभूति से प्रभावित होंगे। आंगन में बंधी, तो कौन देखेगा? धनिया इसके विपरीत सशंक थी। वह गाय को सात परदों के अंदर छिपाकर रखना चाहती थी। अगर गाय आठों पहर कोठरी में रह सकती, तो शायद वह उसे बाहर न निकलने देती। यों हर बात में होरी की जीत होती थी। वह अपने पक्ष पर अड़ जाता था और धनिया को दबना पड़ता था, लेकिन आज धनिया के सामने होरी की एक न चली। धनिया लड़ने को तैयार हो गई। गोबर, सोना और रूपा, सारा घर होरी के पक्ष में था, पर धनिया ने अकेले सबको परास्त कर दिया। आज उसमें एक विचित्र आत्मविश्वास और होरी में एक विचित्र विनय का उदय हो गया ।

मगर तमाशा कैसे रुक सकता था? गाय डोली में बैठकर तो आई न थी। कैसे संभव था। कि गांव में इतनी बड़ी बात हो जाय और तमाशा न लगे। जिसने सुना, सब काम छोड़कर देखने दौड़ा। यह मामूली देशी गऊ नहीं है। भोला के घर से अस्सी रुपये आई है। होरी अस्सी रुपये क्या देंगे, पचास-साठ रुपये में लाये होंगे । गांव के इतिहास में पचास-साठ रुपये की गाय का आना भी अभूतपूर्व बात थी। बैल तो पचास रुपये के भी आये, सौ के भी आये, लेकिन गाय के लिए इतनी बड़ी रकम किसान क्या खा के खर्च करेगा? यह तो ग्वालों ही का कलेजा है। कि अंजुलियों रुपये गिन आते हैं। गाय क्या है, साक्षात् देवी का रूप है। दर्शकों और आलोचकों का तांता लगा हुआ था,और होरी दौड़-दौड़कर सबका सत्कार कर रहा था। इतना विनम्र, इतना प्रसन्न-चित्त वह कभी न था।