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42 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


सुनने की जितनी लालसा होती है, बाहर वालों के मुंह से नहीं। फिर अपने भाई लाख बुरे हों, हैं तो अपने भाई ही। अपने हिस्से-बखरे के लिए सभी लड़ते हैं इससे खून थोड़े ही बंट जाता है। दोनो को बुलाकर दिखा देना चाहिए, नहीं कहेंगे गाय लाए, हमसे कहा तक नहीं।'

धनिया ने नाक सिकोड़कर कहा-मैंने तुमसे सौ बार, हजार बार कह दिया, मेरे मुंह पर भाईयो का बखान न किया करो, उनका नाम सुनकर मेरी देह में आग लग जाती है। सारे गांव ने सुना, क्या उन्होंने न सुना होगा? कुछ इतनी भी दूर नहीं रहते। सारा गांव देखने आया, उन्हीं के पांव मे मेंहदी लगी हुई थी,आएं कैसे? जलन हो रही होगी कि इसके घर गाय आ गई। छाती फटी जाती होगी।

दिया-बत्ती का समय आ गया था। धनिया ने जाकर देखा,तो बोतल में मिट्टी का तेल न था। बोतल उठाकर तेल लाने चली गई। पैसे होते तो रूपा को भेजती, उधार लाना था, कुछ मुंह देखी कहेगी, कुछ लल्लो-चप्पो करेगी, तभी तो तेल उधार मिलेगा।

होरी ने रूपा को बुलाकर प्यार से गोद में बैठाया और कहा-जरा जाकर देख, हीरा काका आ गए कि नहीं। सोमा काका को भी देखती आना कहना, दादा ने तुम्हें बुलाया है। न आएं, हाथ पकड़कर खींच लाना।

रूपा ठुनककर बोली-छोटी काकी मुझे डांटती है।

'काकी के पास क्या करने जायगी। फिर सोभा- बहू तो तुझे प्यार करती है?'

'सोभा काका मुझे चिढ़ाते हैं...मैं न कहूंगी'

'क्या कहते हैं, बता?'

'चिढ़ाते हैं।'

'क्या कहकर चिढ़ाते हैं?'

'कहते हैं, तेरे लिए मूस पकड़ रखा है। ले जा, भूनकर खा ले।'

होरी के अंतस्तल में गुदगुदी हुई।

'तू कहती नहीं,पहले तुम खा लो,तो मैं खाऊंगी।'

'अम्मां मने करती हैं। कहती हैं,उन लोगों के घर न जाया करो'

‘तू अम्मां की बेटी है कि दादा की?'

रूपा ने उसके गले में हाथ डालकर कहा-'अमां की' और हंसने लगी।

‘तो फिर मेरी गोद से उतर जा। आज मैं तुझे अपनी थाली में खिलाऊंगा।'

घर में एक ही फूल की थाली थी। होरी उसी थाली में खाता था। थाली में खाने का गौरव पाने के लिए रूपा होरी के साथ खाती थी। इस गौरव का परित्याग कैसे करे? हुमककर बोली-अच्छा, तुम्हारी।

'तो फिर मेरा कहना मानेगी कि अम्मां का?

'तुम्हारा। '

'तो जाकर हीरा और सोभा को खींच ला।'

'और जो अम्मां बिगड़ें'

'अम्मा से कहने कौन जायगा।'

रूपा कूदती हुई हीरा के घर चली। द्वेष का मायाजाल बड़ी-बड़ी मछलियों को ही फंसाता