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44 : प्रेमचंद रचनावली-6
 

'किसी पर झूठा इल्जाम न लगाना चाहिए।'

'अच्छा, तो यह रुपये कहां से आ गए? कहां से हुन (सोना) बरस पड़ा? उतने ही खेत तो हमारे पास भी हैं। उतनी ही उपज हमारी भी है। फिर क्यों हमारे पास कफन को कौड़ी नहीं और उनके घर नई गाय आती है? '

‘उधार लाए होंगे।'

'भोला उधार देने वाला आदमी नहीं है।'

'कुछ भी हो, गाय है बड़ी सुंदर। गोबर लिए जाता था, तो मैंने रास्ते में देखा'

'बेईमानी का धन जैसे आता है, वैसे ही जाता है। भगवान् चाहेंगे, तो बहुत दिन गाय घर में न रहेगी।'

होरी से और न सुना गया। वह बीती बातों को बिसारकर अपने हृदय में स्नेह और सौहार्द-भरे, भाइयों के पास आया था। इस आघात ने जैसे उसके हृदय में छेद कर दिया और वह रस-भाव उसमें किसी तरह नहीं टिक रहा था। लत्ते और चिथड़े ठूंसकर अब उस प्रवाह को नहीं रोक सकता। जी में एक उबाल आया कि उसी क्षण इस आक्षेप का जवाब दे, लेकिन बात बढ़ जाने के भय से चुप रह गया। अगर उसकी नीयत साफ है, तो कोई कुछ नहीं कर सकता। भगवान् के सामने वह निर्दोष है। दूसरों की उसे परवाह नहीं। उलटे पांव लौट आया । और वह जला हुआ तंबाकू पीने लगा। लेकिन जैसे वह विष प्रतिक्षण उसकी धमनियों में फैलता जाता था। उसने सो जाने का प्रयास किया, पर नींद न आई। बैलों के पास जाकर उन्हें सहलाने लगा, विष शांत न हुआ। दूसरी चिलम भरी, लेकिन उसमें भी कुछ रस न था। विष ने जैसे चेतना को आक्रांत कर दिया हो। जैसे नशे में चेतना एकांगी हो जाती है, जैसे फैला हुआ पानी एक दिशा में बहकर वेगवान हो जाता है, वही मनोवृत्ति उसकी हो रही थी। उसी उन्माद की दशा में वह अंदर गया। अभी द्वार खुला हुआ था। आंगन में एक किनारे चटाई पर लेटी हुई धनिया सोना से देह दबवा रही थी और रूपा जो रोज सांझ होते ही सो जाती थी, आज खड़ी गाय का मुंह सहला रही थी। होरी ने जाकर गाय को खूंटे से खोल लिया और द्वार की ओर ले चला। वह इसी वक्त गाय को भोला के घर पहुंचाने का दृढ़ निश्चय कर चुका था। इतना बड़ा कलंक सिर पर लेकर वह अब गाय को घर में नहीं रख सकता। किसी तरह नहीं।

धनिया ने पूछा-कहां लिए जाते हो रात को?

होरी ने एक पग बढ़ाकर कहा-ले जाता हूं भोला के घर। लौटा दूंगा।

धनिया को विस्मय हुआ, उठकर सामने आ गई और बोली-लौटा क्यों दोगे? लौटाने के लिए ही लाए थे?

'हां, इसके लौटा देने में ही कुसल है।'

'क्यों बात क्या है? इतने अरमान से लाए और अब लौटाने जा रहे हो? क्या भोला रुपये मांगते हैं?

'नहीं, भोला यहां कब आया।'

‘तो फिर क्या बात हुई?'

'क्या करोगी पूछकर ?'

धनिया ने लपककर पगहिया उसके हाथ से छीन ली। उसकी चपल बुद्धि ने जैसे उड़ती