पृष्ठ:गोदान.pdf/५१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
गोदान : 51
 


उस पर दया आ गयी। ' गोबर को उसकी दया बुरी लगी -- यह तुमने क्या किया? उसकी औरत से जाकर कह क्यों नहीं दिया? जूतों से पीटती। ऐसे पाखण्डियों पर दया न करनी चाहिए। तुम मुझे कल उनकी सूरत दिखा दो, फिर देखना कैसी मरम्मत करता हूँ

झुनिया ने उसके अर्द्ध-विकसित यौवन को देखकर कहा- तुम उसे न पाओगे। खास देव है। मुफ्त का माल उड़ाता है कि नहीं।

गोबर अपने यौवन का यह तिरस्कार कैसे सहता? डींग मारकर बोला-मोटे होने से क्या होता है। यहां फौलाद की हड्डियां हैं। तीन सौ दंड रोज मारता हूं। दूध घी नहीं मिलता, नहीं अब तक सीना यों निकल आया होता।

यह कहकर उसने छाती फैलाकर दिखाई।

झुनिया ने आश्वस्त आंखों से देखा-अच्छा, कभी दिखा दूंगी लेकिन वहां तो सभी एक-से हैं, तुम किस-किसकी मरम्मत करोगे? न जाने मरदों की क्या आदत है कि जहां कोई जवान, सुंदर औरत देखी और बस लगे घूरने, छाती पीटने। और यह जो बड़े आदमी कहलाते हैं, ये तो निरे लंपट होते हैं। फिर मैं तो कोई सुंदरी नहीं हूं....

गोबर ने आपत्ति की-तुम । तुम्हें देखकर तो यही जी चाहता है कि कलेजे में बिठा लें।

झुनिया ने उसको पीठ में हलका-सा घूंसा जमाया-लगे औरों की तरह तुम भी चापलूसी करने। मैं जैसी कुछ हूं, वह मैं जानती हूं। मगर लोगों को तो जवान मिल जाय। घड़ी-भर मन बहलाने को और क्या चाहिए। गुन तो आदमी उसमें देखता है, जिसके साथ जनम-भर निबाह करना हो। सुनती भी हूं और देखती भी हूं, आजकल बड़े घरों की विचित्र लीला है। जिस मुहल्ले में मेरी ससुराल है, उसी में गपडू नाम के कासमीरी रहते थे। बड़े भारी आदमी थे। उनके यहां पांच-सेर दूध लगता था। उनकी तीन लड़कियां थीं। कोई बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस की होगी। एक-से-एक सुंदर। तीनों बड़े कॉलिज में पढ़ने जाती थी। एक साइत कॉलिज में पढ़ाती भी थी। तीन सौ का महीना पाती थी। सितार वह सब बजावें, हरमुनियां वह सब बजावें, नाचें वह, गावें वह, लेकिन ब्याह कोई न करती थी। राम जाने, वह किसी मरद को पसंद नहीं करती थीं कि मरद उन्हीं को पसंद नहीं करता था। एक बार मैंने बड़ी बीबी से पूछा, तो हंसकर बोली-हम लोग यह रोग नहीं पालते। मगर भीतर-ही-भीतर खूब गुलछर्रे उड़ाती थीं। जब देखूँ दो-चार लौंडे उनको घेरे हुए हैं। जो सबसे बड़ी थी, वह तो कोट-पतलून पहन कर घोड़े पर सवार होकर मरदों के साथ सैर करने जाती थी। सारे सहर में उनकी लीला मशहूर थी। गपडू बाबू सिर नीचा किये, जैसे मुँह में कालिख-सी लगाये रहते थे। लड़कियों को डाँटते थे, समझाते थे; पर सब-की-सब खुल्लमखुल्ला कहती थीं-तुमको हमारे बीच में बोलने का कुछ मजाल नहीं है। हम अपने मन की रानी हैं, जो हमारी इच्छा होगी, वह हम करेंगे। बेचारा बाप जवान-जवान लड़कियों से क्या बोले। मारने-बाँधने से रहा, डाँटने-डपटने से रहा; लेकिन भाई बड़े आदमियों की बातें कौन चलावे। वह जो कुछ करें, सब ठीक है। उन्हें तो बिरादरी और पंचायत का भी डर नहीं। मेरी समझ में तो यही नहीं आता कि किसी का रोज़-रोज़ मन कैसे बदल जाता है। क्या आदमी गाय-बकरी से भी गया-बीता हो गया है? लेकिन किसी को बुरा नहीं कहती भाई, मन को जैसा बनाओ, वैसा बनता है। ऐसों को भी देखती हूँ, जिन्हें रोज-रोज की दाल-रोटी