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58 : प्रेमचंद रचनावली-6
 

अब मेहता को अवसर मिला। बोले-आप भी तो इसी मरज में गिरफ्तार हैं?

'मैंने प्रतिज्ञा की है कि किसी फिलासफर से शादी करूंगी और यह वर्ग शादी के नाम से घबराता है। हसबेंड साहब तो स्त्री को देखकर घर में छिप जाते थे। उनके शिष्यों में कई लड़कियां थीं। अगर उनमें से कोई कभी कुछ पूछने के लिए उनके फिस में चली जाती थी। तो आप ऐसे घबड़ा जाते, जैसे कोई शेर आ गया हो। हम लोग उन्हें खूब छेड़ा करते थे, बेचारे बड़े सरल-हृदय। कई हजार की आमदनी थी, पर मैंने उन्हें हमेशा एक ही सूट पहने देखा। उनकी एक विधवा बहन थी। वही उनके घर का सारा प्रबंध करती थी। मिस्टर हसबेंड को तो खाने की फिक्र ही न रहती थी। मिलने वालों के डर से अपने कमरे का द्वार बंद करके लिखा-पढ़ी करते थे। भोजन का समय आ जाता, तो उनकी बहन आहिस्ता से भीतर के द्वार से उनके पास जाकर किताब बंद कर देती थी, तब उन्हें मालूम होता कि खाने का समय हो गया। रात को भी भोजन का समय बंधा हुआ था। उनकी बहन कमरे की बत्ती बुझा दिया करती थी। एक दिन बहन ने किताब बंद करनी चाही, तो आपने पुस्तक को दोनों हाथों से दबा लिया और बहन भाई में जोर-आजमाई होने लगी। आखिर बहन उनकी पहिएदार कुर्सी को खींचकर भोजन के कमरे में लाई।

रायसाहब बोले-मगर मेहता साहब तो बड़े खुशमिजाज और मिलनसार हैं, नहीं इस हंगामे में क्यों आते।

'तो आप फिलासफर न होंगे। जब अपनी चिंताओं से हमारे सिर में दर्द होने लगता है, तो विश्व की चिंता सिर पर लादकर कोई कैसे प्रसन्न रह सकता है।'

उधर संपादकजी श्रीमती खन्ना से अपनी आर्थिक कठिनाइयों की कथा कह रहे थे-बस यों समझिए श्रीमतीजी, कि संपादक का जीवन एक दीर्घ विलाप है, जिसे सुनकर लोग दया करने के बदले कानों पर हाथ रख लेते हैं। बेचारा न अपना उपकार कर सके, न औरों का। पब्लिक उससे आशा तो यह रखती है कि हरएक आंदोलन में वह सबसे आगे रहे, जेल जाय, मार खाए घर के माल-असबाब की कुर्की कराए, यह उसका धर्म समझा जाता है, लेकिन उसकी कठिनाइयों की ओर किसी का ध्यान नहीं। हो तो वह सब कुछ करे। उसे हरएक विद्या, हरएक कला में पारंगत होना चाहिए, लेकिन उसे जीवित रहने का अधिकार नहीं। आप तो आजकल कुछ लिखती ही नहीं। आपकी सेवा करने का जो थोड़ा-सा सौभाग्य मुझे मिल सकता है, उससे मुझे क्यों वंचित रखती हैं?

मिसेज खन्ना को कविता लिखने का शौक था। इस नाते से संपादक जी कभी-कभी उनसे मिल आया करते थे, लेकिन घर के काम-धंधों में व्यस्त रहने के कारण इधर बहुत दिनों से कुछ लिख नहीं सकी थीं। सच बात तो यह है कि संपादकजी ने ही उन्हें प्रोत्साहित करके कवि बनाया था। सच्ची प्रतिभा उनमें बहुत कम थी।

‘क्या लिखूं कुछ सूझता ही नहीं। आपने कभी मिस मालती से कुछ लिखने को नहीं कहा?

संपादकजी उपेक्षा भाव से बोले-उनका समय मूल्यवान है कामिनीदेवी। लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार हैं। जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया, वह क्या लिखेंगे?

कामिनी ने ईर्ष्या-मिश्रित विनोद से कहा-अगर आप उनसे कुछ लिखा सकें, तो आपका प्रचार दुगुना हो जाय। लखनऊ में तो ऐसा कोई रसिक नहीं है, जो आपका ग्राहक न बन जाय।