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62 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


सकें।'

'आप श्रेष्ठ किसे समझते हैं, विवाहित जीवन को या अविवाहित जीवन को?

'समाज की दृष्टि से विवाहित जीवन को, व्यक्ति की दृष्टि से अविवाहित जीवन को।

धनुष-यज्ञ का अभिनय निकट था। दस से एक तक धनुष-यज्ञ, एक से तीन तक, प्रहसन यह प्रोगाम था। भोजन की तैयारी शुरू हो गई। मेहमानों के लिए बंगले में रहने का अलग-अलग प्रबंध था। खन्ना-परिवार के लिए दो कमरे रखे गए थे और भी कितने ही मेहमान आ गए थे। सभी अपने-अपने कमरे में गए और कपड़े बदल-बदलकर भोजनालय में जमा हो गए। यहां छूत-छात का कोई भेद न था। सभी जातियों और वर्ण के लोग साथ भोजन करने बैठे। केवल संपादक ओंकारनाथ सबसे अलग अपने कमरे में फलाहार करने गए। और कामिनी खन्ना को सिरदर्द हो रहा था, उन्होंने भोजन करने से इंकार किया। भोजनालय में मेहमानों की संख्या पच्चीस से कम न थी। शराब भी थी और मांस भी। इस उत्सव के लिए रायसाहब अच्छी किस्म की शरब खासतौर पर खिंचवाते थे? खींची जाती थी दवा के नाम से, पर होती थी खालिस शराब। मांस भी कई तरह के पकते थे, कोफ्ते, कबाब और पुलाव। मुर्ग, मुर्गियां, बकरा, हिरन, तीतर, मोर जिसे जो पसंद हो, वह खाए।

भोजन शुरू हो गया तो मिस मालती ने पूछा-संपादकजी कहां रह गए? किसी को भेजो रायसाहब, उन्हें पकड़ लाएं।

रायसाहब ने कहा-वह वैष्णव हैं, उन्हें यहां बुलाकर क्यों बेचारे का धर्म नष्ट करोगी?

बड़ा ही आचारनिष्ठ आदमी है।

'अजी और कुछ न सही, तमाशा तो रहेगा।'

सहसा एक सज्जन को देखकर उसने पुकारा-आप भी तशरीफ रखते हैं मिर्जा खुर्शेद यह काम आपके सुपुर्द। आपकी लियाकत की परीक्षा हो जायगी।

मिर्जा खुर्शेद गोरे-चिट्टे आदमी थे, भूरी-भूरी मूंछें, नीली आंखें, दोहरी देह, चांद के बाल सफाचट। छकलिया अचकन और चूड़ीदार पाजामा पहने थे। ऊपर से हैट लगा लेते थे। कौंसिल के मेंबर थे, पर अधिकांश समय खर्राटे लेते रहते थे। वोटिंग के समय चौंक पढ़ते थे और नेशनलिस्टों की तरफ से वोट देते थे। सूफी मुसलमान थे। दो बार हज कर आए थे, मगर शराब खूब पीते थे। कहते थे, जब हम खुदा का एक हुक्म भी कभी नहीं मानते, तो दीन के लिए क्यों जान दें। बड़े दिल्लगीबाज, बेफिक्रे जीव थे। पहले बसरे में ठीके का कारोबार करते थे। लाखों कमाए, मगर शामत आई कि एक मेम से आशनाई कर बैठे। मुकदमेबाजी हुई। जेल जाते-जाते बचे। चौबीस घंटे के अंदर मुल्क से निकल जाने का हुक्म हुआ। जो कुछ जहां था, वहीं छोड़ा, और सिर्फ पचास हजार लेकर भाग खड़े हुए। बंबई में उनके एजेंट थे। सोचा था, उनसे हिसाब-किताब कर लें और जो कुछ निकलेगा उसी में जिंदगी काट देंगे, मगर एजेंटों ने जाल करके उनसे वह पचास हजार भी ऐंठ लिए। निराश होकर वहां से लखनऊ चले। गाड़ी में एक महात्मा से साक्षात् हुआ। महात्माजी ने उन्हें सब्जबाग दिखाकर उनकी घड़ी, अंगूठियां, रुपये सब उड़ा लिए। बेचारे लखनऊ पहुंचे तो देह के कपड़ों के सिवा कुछ न था। रायसाहब से पुरानी मुलाकात थी। कुछ उनकी मदद से और कुछ अन्य मित्रों की मदद से एक जूते की दुकान खोल ली। वह अब लखनऊ की सबसे चलती हुई जूते की दुकान थी, चार-पांच सौ रोज की बिक्री थी। जनता को उन पर थोड़े ही