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66 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


मौजूद पाएंगी। मिर्जाजी ने पुचारा दिया-आपका बड़े-से-बड़ा दुश्मन भी यह नहीं कह सकता कि आप अपना फर्ज अदा करने में कभी किसी से पीछे रहे।

मिस मालती ने देखा, शराब कुछ-कुछ असर करने लगी हैं, तो और भी गंभीर बनकर बोलीं-अगर हम लोग इस काम की महानता न समझते, तो न यह सभा स्थापित होती और न आप इसके सभापति होते। हम किसी रईस या ताल्लुकेदार को सभापति बनाकर धन खूब बटोर सकते हैं, और सेवा की आड़ में स्वार्थ सिद्ध कर सकते हैं, लेकिन यह हमारा उद्देश्य नहीं। हमारा एकमात्र उद्देश्य जनता की सेवा करना है। और उसका सबसे बड़ा साधन आपका पत्र है। हमने निश्चय किया है कि हर एक नगर और गांव में उसका प्रचार किया जाय और जल्द-से-जल्द उसकी ग्राहक-संख्या को बीस हजार तक पहुंचा दिया जाय। प्रांत की सभी म्युनिसिपैलिटियों और जिला बोर्ड के चेयरमैन हमारे मित्र हैं। कई चेयरमैन तो यहीं विराजमान हैं। अगर हर एक ने पांच-पांच सौ प्रतियां भी ले लीं, तो पचीस हजार प्रतियां तो आप यकीनी समझें। फिर रायसाहब और मिर्जा साहब की यह सलाह है कि कौंसिल में इस विषय का एक प्रस्ताव रखा जाय कि प्रत्येक गांव के लिए बिजली की एक प्रति सरकारी तौर पर मंगाई जाय या कुछ वार्षिक सहायता स्वीकार की जाय और हमें पूरा विश्वास है कि यह प्रस्ताव पास हो जायगा।

ओंकारनाथ ने जैसे नशे में झूमते हुए कहा-हमें गवर्नर के पास डेपुटेशन ले जाना होगा।

मिर्जा खुर्शेद बोले-जरूर-जरूर ।

‘उनसे कहना होगा कि किसी सभ्य शासन के लिए यह कितनी लज्जा और कलंक की बात है कि ग्रामोत्थान का अकेला पत्र होने पर भी बिजली का अस्तित्व तक नहीं स्वीकार किया जाता।'

मिर्जा खुर्शेद ने कहा-अवश्य-अवश्य।

'मैं गर्व नहीं करतीं। अभी गर्व करने का समय नहीं आया, लेकिन मुझे इसका दावा है कि ग्राम्य-संगठन के लिए 'बिजली' ने जितना उद्योग किया है....'

मिस्टर मेहता ने सुधारा-नहीं महाशय, तपस्या कहिए।

'मैं मिस्टर मेहता को धन्यवाद देता हूं। हां, इसे तपस्या ही कहना चाहिए, बड़ी कठोर तपस्या। 'बिजली' ने जो तपस्या की है, वह इस प्रांत के ही नहीं, इस राष्ट्र के इतिहास में अभूतपूर्व है। '

मिर्जा खुर्शेद बोले-जरूर-जरूर।

मिस मालती ने एक पेग और दिया-हमारे संघ ने यह निश्चय भी किया है कि कौंसिल में अब की जो जगह खाली हो, उसके लिए आपका उम्मेदवार खड़ा किया जाय। आपको केवल अपनी स्वीकृति देनी होगी। शेष सारा काम लोग कर लेंगे। आपको न खर्च से मतलब, न प्रोपेगेंडा, न दौड़-धूप से।

ओंकारनाथ की आखों की ज्योति दुगुनी हो गई। गर्वपूर्ण नम्रता से बोले-मैं आप लोगों का सेवक हूं, मुझसे जो काम चाहे ले लीजिए।

'हम लोगों को आपसे ऐसी ही आशा है, हम अब तक झूठे देवताओं के सामने नाक रगड़ते-रगड़ते हार गए और कुछ हाथ न लगा। अब हमने आपमें सच्चा पथ-प्रदर्शक, सच्चा