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गोदान : 69
 


दूसरा सभापति नई है।

मिर्जा ने हाथ जोड़कर कहा-हुजूर, इस कसीदे में तो आपकी तारीफ की गई है।

संपादकजी ने लाल, पर ज्योतिहीन नेत्रों से देखा-तुम हमारी तारीप क्यों की? क्यों की? बोलो, क्यों हमारी तारीप की? हम किसी का नौकर नई है। किसी के बाप का नौकर नई है, किसी साले का दिया नहीं खाते। हम खुद संपादक है। हम 'बिजली' का संपादक है। हम उसमें सबका तारीप करेगा। देवीजी, हम तुम्हारा तारीप नई करेगा? हम कोई बड़ा आदमी नई है। हम सबका गुलाम है। हम आपका चरण-रज है। मालती देवी हमारी लक्ष्मी, हमारी सरस्वती, हमारी राधा....

यह कहते हुए वे मालती के चरणों की तरफ झुके और मुंह के बल फर्श पर गिर पड़े। मिर्जा खुर्शेद ने दौड़कर उन्हें संभाला और कुर्सियां हटाकर वहीं जमीन पर लिटा दिया। फिर उनके कानों के पास मुंह ले बोले-राम-राम सत्त है । कहिए तो आपका जनाजा निकालें?

रायसाहब ने कहा-कल देखना कितना बिगड़ता है। एक-एक को अपने पत्र में रगेदेगा। और ऐसा रगेदेगा कि आप भी याद करेंगे । एक ही दुष्ट है, किसी पर दया नहीं करता। लिखने में तो अपना जोड़ नहीं रखता। ऐसा गधा आदमी कैसे इतना अच्छा लिखता है, यह रहस्य है।

कई आदमियों ने संपादकजी को उठाया और ले जाकर उनके कमरे में लिटा दिया। उधर पंडाल में धनुष-यज्ञ हो रहा था। कई बार इन लोगों को बुलाने के लिए आदमी आ चुके थे। कई हुक्काम भी पंडाल में आ पहुंचे थे। लोग उधर जाने को तैयार हो रहे थे कि सहसा एक अफगान आकर खड़ा हो गया। गोरा रंग, बड़ी-बड़ी मूंछें, ऊंचा कद, चौड़ा सीना, आंखों में निर्भयता का उन्माद भरा हुआ, ढीला नीचा कुरता, पैरों में शलवार, जरी के काम की सदरी, सिर पर पगड़ी और कुलाह, कंधे में चमड़े का बैग लटकाए, पर बंदूक रखे और कमर में तलवार बांधे न जाने किधर से आ खड़ा हो गया और गरजकर बोला-खबरदार कोई यहां से मत जाओ। अमारा साथ का आदमी पर डाका पड़ा है। यहां का जो सरदार है, वह अमारा आदमी को लूट लिया है, उसका माल तुमको देना होगा। एक-एक कौड़ी देना होगा। कहां है सरदार, उसको बुलाओ।

रायसाहब ने सामने आकर क्रोध-भरे स्वर में कहा-कैसी लूट। कैसा डाका? यह तुम लोगों का काम है। यहां कोई किसी को नहीं लूटता। साफ-साफ कहो, क्या मामला है।

अफगान ने आंखें निकालीं और बंदूक का कुंदा जमीन पर पटककर बोला-अमसे पूछता है कैसा लूट, कैसा डाका? तुम लूटता है, तुम्हारा आदमी लूटता है। अम यहां की कोठी का मालिक है। अमारी कोठी में पचीस जवान हैं। अमारा आदमी रुपये तहसील कर लाता था। एक हजार। वह तुम लूट लिया, और कहता है, कैसा डाका? अम बताएगा, कैसा डाका होता है। अमारा पचीसों जवान अबी आता है। अम तुम्हारा गांव लूट लेगा। कोई साला कुछ नई कर सकता, कुछ न कर सकता।

खन्ना ने अफगान के तेवर देखे तो चुपके से उठे कि निकल जायं। सरदार ने जोर से डांटा-कां जाता तुम? कोई कई नई जा सकता, नई अम सबको कतल कर देगा। अभी फैर कर देगा। अमारा तुम कुछ नई कर सकता। अम तुम्हारा पुलिस से नई डरता। पुलिस का आदमी