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86 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


लोग घर फूककर तमाशा देखते हैं। कर्ज का बोझ सिर पर लदा जा रहा है, रोज डिगरियां हो रही हैं। जिससे लेते हैं, उसे देना नहीं जानते, चारों तरफ बदनाम। मैं तो ऐसी जिंदगी से मर जाना अच्छा समझता हूं। मालूम नहीं, किसी संस्कार से मेरी आत्मा में जरा-सी जान बाकी रह गई, जो मुझे देश और समाज के बंधन में बांधे हुए है। सत्याग्रह आंदोलन छिड़ा। मेरे सारे भाई शराब-कबाब में मस्त थे। मैं अपने को न रोक सका। जेल गया और लाखों रुपये की जेरबारी उठाई और अभी तक उसका तावान दे रहा हूं। मुझे उसका पछतावा नहीं है। बिल्कुल नहीं। मुझे उसका गर्व है? मैं उस आदमी को आदमी नहीं समझता, जो देश और समाज की भलाई के लिए उद्योग न करे और बलिदान न करे। मुझे क्या यह अच्छा लगता है कि निर्जीव किसानों का रक्त चूसूं और अपने परिवार वालों की वासनाओं की तृप्ति के साधन जुटाऊं, मगर करूं क्या? जिस व्यवस्था में पला और जिया, उससे घृणा होने पर भी उसका मोह त्याग नहीं सकता और उसी चर्खे में रात-दिन पड़ा हुआ हूं कि किसी तरह आबरू-इज्जत बची रहे, और आत्मा की हत्या न होने पाए। ऐसा आदमी मिस मालती क्या, किसी भी मिस के पीछे नहीं पढ़ सकता, और पड़े तो उसका सर्वनाश ही समझिए। हां, थोड़ा-सा मनोरंजन कर लेना दूसरी बात है।'

मिस्टर खन्ना भी साहसी आदमी थे, संग्राम में आगे बढ़ने वाले। दो बार जेल हो आए थे। किसी से दबना न जानते थे। खद्दर पहनते थे और फ्रांस की शराब पीते थे। अवसर पड़ने पर बड़ी-बड़ी तकलीफें झेल सकते थे। जेल में शराब छुई तक नहीं, और 'ए' क्लास में रहकर भी 'सी' क्लास की रोटियां खाते रहे, हालांकि, उन्हें हर तरह का आराम मिल सकता था, मगर रण-क्षेत्र में जाने वाला रथ भी तो बिना तेल के नहीं चल सकता। उनके जीवन में थोड़ी-सी रसिकता लाजिमी थी। बोले-आप संन्यासी बन सकते हैं, मैं तो नहीं बन सकता। मैं तो समझता हूं, जो भोगी नहीं है, वह संग्राम में भी पूरे उत्साह से नहीं जा सकता। जो रमणी से प्रेम नहीं कर सकता, उसके देशप्रेम में मुझे विश्वास नहीं।

रायसाहब मुस्कराए-आप मुझी पर आवाजें कसने लगे

'आवाज नहीं है, तत्व की बात है।'

'शायद हो।'

'आप अपने दिल के अंदर पैठकर देखिए तो पता चले।'

'मैंने तो पैठकर देखा है, और मैं आपको विश्वास दिलाता हूं, वहां और चाहे जितनी बुराइयां हों, विषय की लालसा नहीं है।'

'तब मुझे आपके ऊपर दया आती है। आप जो इतने दुखी और निराश और चिंतित हैं, इसका एकमात्र कारण आपका निग्रह है। मैं तो यह नाटक खेलकर रहूंगा, चाहे दुखांत ही क्यों न हो। वह मुझसे मजाक करती है, दिखाती है कि मुझे तेरी परवाह नहीं है, लेकिन मैं हिम्मत हारने वाला मनुष्य नहीं हूं। मैं अब तक उसका मिजाज नहीं समझ पाया। कहां निशाना ठीक बैठेगा, इसका निश्चय न कर सका। जिस दिन यह जी मिल गई, बस फतह है।'

'लेकिन वह कुंजी आपको शायद ही मिले। मेहता शायद आपसे बाजी मार ले जायं।'

एक हिरन कई हिरनियों के साथ चर रहा था, बड़ी सींगों वाला, बिल्कुल काला। रायसाहब ने निशाना बांधा। खन्ना ने रोका-क्यों हत्या करते हो यार? बेचारा चर रहा है, चरने दो। धूप तेज हो गई। आइए कहीं बैठ जायं। आपसे कुछ बातें करनी हैं।

रायसाहब ने बंदूक चलाई, मगर हिरन भाग गया। बोले-एक शिकार मिला भी तो निशाना