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94 : प्रेमचंद रचनावली-6
 

94: प्रेमचंद रचनावली-6 पर स्थूलकाय तंखा पीछे रह गए। उन्होंने पुकारा-जरा सुनिए, मिर्जाजी, आप तो भागे जा रहे हैं। मिर्जाजी ने बिना रुके हुए जवाब दिया-वह गरीब बोझ लिए इतनी तेजी से चला जा रहा है। हम क्या अपना बदन लेकर भी उसके बराबर नहीं चल सकते? लकड़हारे ने हिरन को एक ढूंठ पर उतारकर रख दिया था और दम लेने लगा था। कर पूछा-थक गए, क्यों? लकड़हारे ने सकुचाते हुए कहा-बहुत भारी है सरकार । 'तो लाओ, कुछ दूर मैं ले चलूं।' लकड़हारा हंसा। मिर्जा डील-डौल में उससे कहीं ऊंचे और मोटे-ताजे थे, फिर भी वह दुबला-पतला आदमी उनकी इस बात पर हंसा। मिर्जाजी पर जैसे चाबुक पड़ गया। 'तुम हंसे क्यों? क्या तुम समझते हो, मैं इसे नहीं उठा सकता?' लकड़हारे ने मानो क्षमा मांगी-सरकार आप बडे आदमी हैं। बोझ उठाना तो हम-जैसे मजूरों का ही काम है। 'मैं तुम्हारा दुगुना जो हूं।' 'इससे क्या होता है मालिक ।' मिर्जाजी का पुरुषत्व अपना और अपमान न सह सका। उन्होंने बढ़कर हिरन को गर्दन पर उठा लिया और चले, मगर मुश्किल से पचास कदम चले होंगे कि गर्दन फटने लगी, पांव थरथराने लगे और आंखों में तितलियां उड़ने लगीं। कलेजा मजबूत किया और एक बीस कदम और चले।कम्बख्त कहां रह गया? जैसे इस लाश में सीसा भर दिया गया हो। जरा मिस्टर तखा की गर्दन पर रख दूं, तो मजा आए। मशक की तरह जो फूले चलते हैं, जरा इसका मजा भी देखें,लेकिन बोझा उतारेंकैसे? दोनों अपने दिल में कहेंगे,बड़ी जवामर्दी दिखाने चले थे। पचास कदम में ची बोल गए। लकड़हारे ने चुटकी ली-कहो मालिक, कैसे रंग-ढंग हैं? बहुत हलका है न? मिर्जाजी को बोझकुछ हलका मालूम होने लगा। बोले-उतनी दूर तो ले ही जाऊंगा, जितनी दूर तुम लाए हो। 'कई दिन गर्दन दुखेगी मालिक।' 'तुम क्या समझते हो, मैं यों ही फूला हुआ हूं।' 'नहीं मालिक, अब तो ऐसा नहीं समझता। मुदा आप हैरान न हों, वह चट्टान है, उस पर उतार दीजिए।' 'मैं अभी इसे इतनी ही दूर और ले जा सकता हूं।' 'मगर यह अच्छा तो नहीं लगता कि मैं ठाला चलं और आर लदे रहें।' मिर्जा साहब ने चट्टान पर हिरन को उतारकर रख दिया। वकील साहब आ पहुंचे। मिर्जा ने दाना फेंका-अब आपको भी कुछ दूर ले चलना पड़ेगा जनाब। वकील साहब की नजरों में अब मिर्जाजी का कोई महत्त्व न था। बोले-मुआफ कीजिए। मुझे अपनी पहलवानी का दावा नहीं है। 'बहुत भारी नहीं है सच।' 'अजी, रहने भी दीजिए।