पृष्ठ:गोदान.pdf/९७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
गोदान : 97
 

जब ये लोग सूर्यास्त के समय यहां से बिदा हुए तो गांव-भर के नर-नारी इन्हें बडी दर तक पहुंचाने आए। कई तो रोते थे। ऐसा सौभाग्य उन गरीबों के जीवन में शायद पहली बार आया हो कि किसी शिकारी ने उनकी दावत की हो। जरूर यह कोई राजा है, नहीं तो इतना दरियाव दिल किसका होता है। इनके दर्शन फिर काहे को होंगे। कुछ दूर चलने के बाद मिर्जा ने पीछे फिरकर देखा और बोले-बेचारे कितने खुश थे। काश, मेरी जिंदगी में ऐसे मौके रोज आते। आज का दिन बड़ा मुबारक था। तन्खा ने बेरुखी के साथ कहा--आपके लिए मुबारक होगा, मेरे लिए तो मनहूस ही था। मतलब की कोई बात न हुई। दिन-भर जंगलों और पहाड़ों की खाक छानने के बाद अपना-सा मुंह लिए लौटे जाते हैं। मिर्जा ने निर्दयता से कहा-मुझे आपके साथ हमदर्दी नहीं है। दोनों आदमी जब बरगद के नीचे पहुंचे, तो दोनों टोलियां लौट चुकी थीं। मेहता मुंह लटकाए हुए थे। मालती विमन-सी अलग बैठी थी,जो नई बात थी। रायसाहब और खन्ना दोनों भूखे रह गए थे और किसी के मुंह से बात न निकलती थी। वकील साहब इसलिए दुःखी थे कि मिर्जा ने उनके साथ बेवफाई की। अकेले मिर्जा साहब प्रसन्न थे और वह प्रसन्नता अलौकिक थी।


आठ

जब से होरी के घर में गाय आ गई है, घर की श्री ही कुछ और हो गई है। धनिया का घमंड तो उसके संभाल से बाहर हो-हो जाता है। जब देखो, गाय की चर्चा। भूसा छिज गया था। ऊख में थोड़ी-सी चरी बो दी गई थी। उम्मी की कुट्टी काटकर जानवरों को खिलाना पड़ता था। आंखें आकाश की ओर लगी रहती थी कि पानी बरसे और घास निकले। आधा असाढ बीत गया और वर्षा न हुई। सहसा एक दिन बादल उठे और असाढ़ का पहला दौंगड़ा (पहली वर्षा) गिरा। किसान खरीफ बोने के लिए हल ले-लेकर निकले कि रायसाहब के कारकुन ने कहला भेजा, जब तक बाकी न चुक जायगी. किसी को खेत में हल न ले जाने दिया जायगा। किसानों पर जैसे वज्रपात हो गया। और कभी तो इतनी कडाई न होती थी, अबकी यह कैसा हुक्म। कोई गांव छोड़कर भागा थोड़े ही जाता है, अगर खेतों में हल न चले, तो रुपये कहां से आ जायंगे? निकालेंगे तो खेत ही से। सब मिलकर कारकन के पास जाकर रोए। कारकुन का नाम था पडित नोखेराम। आदमी बरे न थे, मगर मालिक का हक्म था। उसे कैसे टालें? अभी उस दिन रायसाहब ने होरी से कैसी दया और धर्म की बातें की थी और आज असामियों पर यह जुल्म हारी मालिक के पास जाने को तैयार हुआ, लेकिन फिर सोचा, उन्होंने कारकुन को एक बार जो हुक्म दे दिया, उसे क्यों टालने लगे? वह अगुवा बनकर क्यों बुरा बने? जब और कोई कुछ नहीं बोलता, तो वही आग में क्यों कूदे? जो सबके सिर पड़ेगी, वह भी झेल लेगा। किसानों में खलबली मची हई थी। सभी गांव के महाजनों के पास रुपये के लिए दौडे।