पृष्ठ:चाँदी की डिबिया.djvu/९६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


चांदी की डिबिया [अङ्क २ 66 दीजिये" - "मेरी "

9

कल सुलूस " हु.जूर एक श्रादमी रखलें". बीबी और तीन बच्चे हैं, इन बातों से मेरा जी ऊब गया । इससे तो अच्छा यही है, कि यहीं पड़े पड़े मर जाऊँ । लोग मुझसे कहते हैं “ जोन्स, में शरीक हो जाव, एक झंडा उठा लो, और लालमुह वाले नेताओं की बातें सुनो। फिर अपना सा मुह लिए घर लौट जाव । कुछ लोगों को यह पसंद होगा। जब मैं काम की टोह में जाता हूँ और बदमाशों को अपनी ओर सिर से पैर तक ताकते : देखता हूँ, तो जान पड़ता है मेरे हजारों साँप काट रहे हैं । मैं किसी से कोई रियायत नहीं चाहता । एक आदमी पसीने की कमाई खाना चाहता है, पर उसे काम नहीं मिलता । कैसी दिल्लगी है ! एक श्रादमी छाती फाड़ कर काम करना चाहता है, कि किसी तरह प्राण बचे ओर उसे कोई नहीं पूछता! यह न्याय है -यह स्वाधीनता है ! और न जाने क्या-क्या है । उन