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चोखे चौपदे

घिर गये पर जब निकल पाये नही।
तब रहे क्या दूसरो को घेरते॥
आप ही जब फेर में वे है पड़े।
हाथ तब तलवार क्या है फेरते॥

खोल दिल पर-धन लुटाता है सभी।
कौन निज धन दान दे यश ले सका॥
वह भले ही फूल बरसाता रहे।
फूल कर के हाथ फूल न दे सका॥

मान उन को न चाहिये देना।
जो मिले मान फूल है जाते॥
जब न पाते रहे भले फल तो।
क्या रहे हाथ फूल बरसाते॥

खेलने मे बिगड़ बने सीधे।
फिर लगे बार बार लड़ने भी॥
वे रहे कम नही बने बिगड़े।
हाथ अब तो लगे उखड़ने भी॥