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चोखे चौपदे

जो भरोसे न भाग के सोये।
दैव उन से फिरा नही फिर कर॥
जो रखें जान गिर उठें वे ही।
कब भला दाँत उठ सका गिर कर॥

हैं दुखी दीन को सताते सब।
हो न पाई कभी निगहबानी॥
लग सका और दाँत में न कभी।
हिल गये दाँत मे लगा पानी॥

नटखटों से बचे रहे कब तक।
जब उन्हे छोड़ नटखटी न हटी॥
क्या हुआ बार बार बच बच कर।
कब भला दाँत से न जीभ कटी॥

क्यों किसी बेगुनाह को दुख दें।
छूट क्यों जाँय कर गुनाह सगे॥
और के हाथ में लगे तब क्यों।
जब बुरी जीभ में न दॉत लगे॥