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जनमेजय का नाग-यज्ञ

प्रतिहारी―(प्रवेश करके) महाराज की जय हो। आचार्य आ रहे हैं।

[ काश्यप पुरोहित का वकते-झकते प्रवेश ]

काश्यप―यह क्या! इसका लकड़दादा कवप एक दासी का पुत्र था, इसीलिये ऋषियो ने भोजन के समय उसे अपनी पंक्ति से निकाल दिया था। उसी का वंशधर तुर-फुर! भला यह क्या जाने कि अभिषेक किसे कहते है! दासी-पुत्र के वंशधर के किए अभिषेक से तुम सम्राट हो जाओगे! ऐ! देखोगे इसका परिणाम, भोगोगे इसका फल! मै कौरवो का प्राचीन पुरोहित; वंशपरंपरा से मेरा अधिकार; राजकुल का दैव; उसोका इतना अपमान!

तुर―ऋषिवर्य, क्षमा हो। राष्ट्र के कामो को रोक देना भी तो उचित नहीं था। भला सोचिए कि वहाँ तो ब्राह्मण-कन्याएँ दस्युओ से अपहृत हो रही हो, और यहाँ आप इन्हे तक्षशिला विजय से रोकें! क्या वे आपके हो स्वजन नहीं? क्या वे इस राज्य मे नहीं रहते? क्या उनकी रक्षा का भार इन्द्रप्रस्थ के सम्राट् पर नहीं है?

काश्यप―मै कौरवों का कर्मकाण्ड कराते-कराते वुड्ढा हो गया; किन्तु तुम्हारे समान लफङ्गा इस राज-सभा में आज तक न देखा। क्या राजतन्त्र जो चाहे, वही करता जाय; और अध्यात्म के गुरु ब्राह्मण उसी की हॉ मे हाँ मिलाते जायँ? यदि ऐसा ही था, तो ब्राह्मणों को दण्ड देने का अधिकार भी राजा को क्यों न