पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/४५

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छठा दृश्य
स्थान―गुरुकुल
[ त्रिविक्रम और दो विद्यार्थी ]

त्रिविक्रम―अरे चुप भी रहो! क्या टाँयँ टाँयँ कर रहे हो!

पह० विद्यार्थी―अरे भाई, अब दूसरी शाखा का अध्ययन प्रारम्भ करूँगा। यह अब समाप्त हो चली है। थोड़ा सा और परिश्रम है।

त्रिविक्रम―शाखा! किसकी शाखा?

पह० विद्यार्थी―वेद की।

त्रिविक्रम―वेद! चुप मूर्ख! गुरुजी क्या कोई वृक्ष हैं जो उनमे शाखाएँ होगी?

पह० विद्यार्थी―भाई हँसी मत करो। मैं श्रुति के लिये कह रहा हूँ।

त्रिविक्रम―सो तो मै सुनता हूँ। अच्छा बताओ तो पढ़ कर करोगे क्या? इस शाखामृग का अनुकरण करने से क्या लाभ होगा?

पह० विद्यार्थी―विद्ययाऽमृतमश्नुते।

त्रिविक्रम―अमृत होकर तुम क्या करोगे? कब तक इस दुरन्तपूरा उदर दरी को भरोगे? अनन्त काल तक यह महान् प्रयास! बड़ी कठोरता है!