पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/९५

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जनमेजय का नाग-यज्ञ

उत्तङ्क―जैसा सदैव से होता आया है! सम्राज्ञी, ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित्त करने और अपयश से बचने के लिये ही तो यह समस्त आयोजन है। बहुत अनुनय विनय करने पर कुछ ब्राह्मण यज्ञ कराने के लिये उद्यत हुए है, सो भी जब कुलपति शौनक ने आचार्य होना स्वीकृत किया है, तब।

वपुष्टमा―यह सब करने पर भी क्या होगा?

उत्तङ्क―राष्ट्र तथा समाज के शासन को दृढ़ करना ही इसका एक मात्र उद्देश्य है।

वपुष्टमा―तब आर्य इस धर्म क्यो कहते हैं?

उत्तङ्क―सम्राज्ञो, क्या धर्म कोई इतर वस्तु है? वह तो व्यापक है। भला बिना उसके कही राष्ट्र नीति और समाज नीति चल सकती है?

वपुष्टमा―मै तो घबरा रही हूँ!

उत्तङ्क―कल्याणी, सावधान रहे। आप सम्राज्ञा है; फिर ऐसी दुर्बलता क्यो? नियति का क्रोड़ा कन्दुक नीचा ऊँचा होता हुआ अपने स्थान पर पहुँच ही जायगा। चिन्ता क्या है? केवल कर्म करते रहना चाहिए।

वपुष्टमा―आर्य, आशीर्वाद दीजिए कि पति देवता के कार्य मे मै सहकारिणी रहूँ, और मरण में भी पश्चात्पद न होऊँ।

उत्तङ्क―पौरव कुल वधू के योग्य साहस हो; कल्याण हो!

[ जाता है ]
 
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